नई दिल्ली, 16 नवम्बर (अशोक “अश्क”) अमेरिका द्वारा लगातार दबाव बनाए जाने के बावजूद भारत और रूस के रिश्तों में दरार डालने की कोशिशें नाकाम होती दिखाई दे रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारतीय बाजार पर 25 फीसदी टैरिफ लगाकर रूसी तेल की खरीद को कम करने और दोनों देशों के संबंध कमजोर करने की रणनीति अपना रहे हैं। इसके साथ ही अमेरिकी प्रशासन रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर भारत पर अप्रत्यक्ष दबाव बना रहा है। हालांकि, इन सभी कोशिशों के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा रिश्तों की मजबूती का संकेत देता है।

पुतिन तीन साल बाद 5 दिसंबर को भारत आ रहे हैं। वे 23वीं भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक की संयुक्त अध्यक्षता पीएम नरेंद्र मोदी के साथ करेंगे। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पुतिन के इस दौरे पर दुनिया की निगाहें टिकी होंगी। अमेरिका और पश्चिमी देश रूसी तेल पर लगातार प्रतिबंध बढ़ा रहे हैं, जिसके चलते भारत ने भी पिछले महीनों में रूसी तेल की खरीद कुछ कम की है। ऐसे माहौल में पुतिन की भारत यात्रा कई रणनीतिक और आर्थिक मायनों में बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
भारत और रूस के बीच वर्तमान में 68.7 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है, जिसमें भारत का आयात कहीं अधिक है। केवल तेल आयात के कारण भारत का व्यापार घाटा 59 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। ऐसे में उम्मीद है कि पुतिन और मोदी की मुलाकात में ऊर्जा, व्यापार संतुलन और भुगतान व्यवस्था को लेकर बड़े फैसले हो सकते हैं। दोनों देशों ने 2030 तक व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है, जिसके लिए विस्तृत रोडमैप तैयार किया जा सकता है।
यात्रा के दौरान रक्षा क्षेत्र में भी बड़े समझौते संभव हैं। चर्चा के एजेंडे में सुखोई-57 लड़ाकू विमान, S-400 मिसाइल सिस्टम की अतिरिक्त यूनिट, S-500 निर्माण सहयोग, आर्कटिक क्षेत्र में निवेश, व्लादिवोस्तोक–चेन्नई समुद्री कॉरिडोर और कृषि व्यापार शामिल हो सकते हैं।
मजदूरों के लिए भी अच्छी खबर आ सकती है, क्योंकि रूस 70 हजार भारतीय श्रमिकों के लिए अवसर खोलने पर विचार कर रहा है। ऐसे समय में जब अमेरिका भारत–रूस रिश्तों पर टैरिफ और प्रतिबंधों के जरिए दबाव बना रहा है, पुतिन का भारत दौरा दोनों देशों की साझेदारी को नई मजबूती दे सकता है।

