नई दिल्ली,10 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) हरियाणा सरकार की प्रस्तावित अरावली जंगल सफारी पार्क परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। यह फैसला 10,000 एकड़ में फैली इस परियोजना के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। याचिका भारतीय वन सेवा (आईएफएस) के पांच सेवानिवृत्त अधिकारियों और पर्यावरण समूह पीपल फॉर अरावलीज की ओर से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह परियोजना अरावली की नाजुक पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा है और इसे व्यावसायिक सफारी पार्क के बजाय संरक्षण क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने 8 अक्टूबर को याचिका पर सुनवाई करते हुए हरियाणा सरकार और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को नोटिस जारी किया है। साथ ही अदालत ने यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई 15 अक्टूबर तक राज्य सरकार परियोजना से संबंधित कोई भी निर्माण या गतिविधि न करे।
मुख्य याचिकाकर्ता डॉ. आरपी बलवान ने बताया कि इस परियोजना में होटल, रेस्तरां, केबल कार और अन्य स्थायी संरचनाओं का प्रस्ताव है, जो गुरुग्राम और नूंह जिलों के बीच फैले अरावली क्षेत्र को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा। उन्होंने कहा कि इससे न केवल पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई होगी, बल्कि जैव विविधता भी प्रभावित होगी।
सह-याचिकाकर्ता विनोद भाटिया ने बताया कि प्रस्तावित क्षेत्र फरीदाबाद की मंगर बानी और दिल्ली के असोला वन्यजीव अभयारण्य को जोड़ने वाले वन्यजीव कॉरिडोर का हिस्सा है। यदि सफारी पार्क बना, तो यह कॉरिडोर बाधित होगा और 400 से अधिक देशी पेड़ प्रजातियां और 200 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां खतरे में पड़ जाएंगी।
वहीं, डॉ. उमा शंकर सिंह ने कहा कि इस तरह के सफारी पार्क वास्तव में चिड़ियाघर जैसे होते हैं, जहां जानवरों को बंद जगहों में रखने से वे ‘जूकोसिस’ नामक मानसिक बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं।
पीपल फॉर अरावलीज की संस्थापक नीलम अहलूवालिया ने इसे सार्वजनिक न्यास सिद्धांत का उल्लंघन बताया और कहा कि अरावली के संरक्षण की जिम्मेदारी राज्य और केंद्र, दोनों की है।

