नई दिल्ली, 25 नवम्बर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कानून के बढ़ते दुरुपयोग पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रतिशोध की भावना से दर्ज मामलों पर अदालतों को सजग रहना होगा। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच गुवाहाटी के एक व्यवसायी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) और 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत दर्ज मामले की सुनवाई कर रही थी। पीटीआई के अनुसार, बेंच ने व्यवसायी के खिलाफ मामला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि शिकायत और साक्ष्यों के परीक्षण से यह स्पष्ट है कि व्यवसायी इंदर चंद बागड़ी के विरुद्ध धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात का कोई पुख्ता मामला स्थापित नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता जगदीश प्रसाद बागड़ी के पास विवादित संपत्ति के विक्रय विलेख को रद्द कराने या संविदात्मक अधिकारों के उल्लंघन पर हर्जाना मांगने के लिए दीवानी कानून के तहत पर्याप्त उपाय उपलब्ध हैं।
बेंच ने कहा कि आपराधिक कानून को आपसी रंजिश और प्रतिशोध का साधन नहीं बनने दिया जा सकता। अदालत के अनुसार, इंदर चंद बागड़ी के खिलाफ किसी भी प्रकार की आपराधिक मंशा सिद्ध नहीं होती और अभियोजन पक्ष के आरोप टिकने योग्य नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा बनाम भजन लाल (1992) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वर्तमान अभियोजन दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होता है, इसलिए इसे जारी रखना न तो न्यायोचित है और न ही न्याय के हित में।

