पटना, 09 दिसम्बर (पटना डेस्क) बिहार में विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद लिए जा रहे लगातार तेज-तर्रार फैसलों ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। आम चर्चा यह है कि अब राज्य की कमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथ में कम और भाजपा के हाथों में ज्यादा है। राजनीतिक विश्लेषक ये तक कहने लगे हैं कि नीतीश अब सिर्फ ‘चेहरे’ के तौर पर कायम हैं, जबकि वास्तविक नियंत्रण भाजपा ने अपनी रणनीति से मजबूती से पकड़ लिया है।बीते कुछ हफ्तों में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों ने इस चर्चा को और हवा दी है। सबसे बड़ा संकेत उस समय मिला जब 5 दिसंबर को 18वीं विधानसभा के पहले सत्र की समाप्ति के दौरान मुख्यमंत्री की जगह उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सरकार की तरफ से जवाब दिया।

जबकि नीतीश कुमार पटना में ही मौजूद थे। परंपरा रही है कि सत्र का जवाब मुख्यमंत्री ही देते हैं, लेकिन इस बार यह जिम्मेदारी सम्राट को दी गई। इसे नीतीश की कमजोर होती पकड़ और भाजपा की बढ़ती ताकत का सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है।इसके साथ ही पहली बार नीतीश ने अपना सबसे शक्तिशाली विभाग—गृह मंत्रालय—भाजपा को सौंप दिया। नई कैबिनेट में सम्राट चौधरी को गृह मंत्री बनाया गया है, जबकि पिछली सरकार में उनके पास केवल वित्त विभाग था। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भाजपा की बढ़ती राजनीतिक पकड़ और उनकी आक्रामक रणनीति का हिस्सा है।सूत्रों की मानें तो दो IAS अधिकारी, जो दिल्ली डेपुटेशन पर हैं, अपना कार्यकाल बीच में छोड़कर जल्द ही बिहार लौट सकते हैं और CMO में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। माना जा रहा है कि यह भाजपा की भविष्य की रणनीति का संकेत है।नीतीश कुमार भले ही लगातार बैठकों और दौरों में सक्रिय दिख रहे हों, लेकिन न मीडिया से संवाद कर रहे और न सदन में प्रभावी बयान दे रहे हैं। बड़े फैसलों की घोषणा भी वह X के जरिए कर रहे हैं। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है—बिहार की असली स्टियरिंग अब किसके हाथ में है?

