नई दिल्ली, 1 सितम्बर (अशोक “अश्क”) सरकारी प्राथमिक शिक्षकों की उच्च प्राथमिक स्कूलों में पदोन्नति के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता और अल्पसंख्यक विद्यालयों में शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून लागू होने-न होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला सोमवार को आने वाला है। इस मामले में कई राज्यों से याचिकाएं दायर हुई हैं, लेकिन फैसला अंजुमन इशत ए तालीम ट्रस्ट बनाम महाराष्ट्र सरकार की मुख्य याचिका पर सुनाया जाएगा। इस फैसले पर देशभर के लाखों शिक्षक पूरी उत्सुकता से नजर रखे हुए हैं।

इस प्रकरण की पिछली सुनवाई तीन अप्रैल को हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का प्रभाव पूरे भारत के शिक्षा विभाग पर लागू होगा। मामला मद्रास हाईकोर्ट के 2 जून 2023 के आदेश से जुड़ा है, जिसमें उच्च प्राथमिक विद्यालय में पदोन्नति या नियुक्ति के लिए उच्च प्राथमिक स्तर की टीईटी और प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक पद पर पदोन्नति के लिए प्राथमिक स्तर की टीईटी उत्तीर्ण होना अनिवार्य बताया गया था। तमिलनाडु सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
यह मामला उत्तर प्रदेश से भी संबंधित है। वर्ष 2017 में दीपक शर्मा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पदोन्नति में टीईटी को अनिवार्य करार दिया था, जिसके कारण पदोन्नति प्रक्रिया ठप हो गई। 31 जनवरी 2023 को प्रक्रिया तो शुरू हुई, लेकिन टीईटी को लेकर विवाद के कारण हाईकोर्ट ने इसे फिर से रोक दिया।
सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार बनाम आर. वरुन की विशेष अनुज्ञा याचिका में प्रतापगढ़ के राहुल पांडे ने एनसीटीई की 23 अगस्त 2010 और 12 नवंबर 2014 की अधिसूचनाओं को पदोन्नति में लागू कराने के लिए इंटरवेंशन याचिका दाखिल की है। वहीं, सरोज देवी ने मांग की है कि 23 अगस्त 2010 या 29 जुलाई 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर पदोन्नति में टीईटी अनिवार्य न हो।
राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता अंकित गोयल ने भी स्थिति स्पष्ट करने के लिए आवेदन किया है। सोमवार के फैसले से यह स्पष्ट होगा कि पदोन्नति में टीईटी अनिवार्य होगा या नहीं, वरिष्ठता पहली नियुक्ति तिथि से मानी जाएगी या पहली पदोन्नति तिथि से, और अल्पसंख्यक विद्यालयों में आरटीई कानून लागू होगा या नहीं। इस फैसले से लंबे समय से अटकी उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों के शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया साफ हो जाएगी।

