नई दिल्ली, 20 नवम्बर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तलाक-ए-हसन प्रथा की वैधता पर गंभीर सवाल उठाते हुए संकेत दिया कि वह इस प्रथा को असंवैधानिक घोषित कर सकता है। यह प्रथा मुस्लिम पुरुषों को तीन महीनों में एक-एक बार ‘तलाक’ कहकर विवाह खत्म करने का एकतरफा अधिकार देती है। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यह मुद्दा समाज के व्यापक हिस्से को प्रभावित करता है और संभव है कि इसे पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने की आवश्यकता पड़े। अदालत ने संबंधित पक्षों से उन संवैधानिक प्रश्नों की सूची मांगी है जिन्हें बड़े पीठ के समक्ष रखा जा सकता है। अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी, जिसमें तलाक-ए-हसन की वैधता पर विस्तृत विचार किया जाएगा।

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने तलाक-ए-हसन को महिला गरिमा के विरुद्ध बताते हुए कहा कि “2025 में ऐसी प्रथा को कैसे स्वीकार किया जा सकता है? सभ्य समाज में भेदभावपूर्ण परंपराएं नहीं चल सकतीं।” उन्होंने प्रश्न किया कि जब तलाक नोटिस पर पति के हस्ताक्षर ही नहीं होते, तो इसे वैध माना ही कैसे जाए? अदालत ने यह भी कहा कि महिलाओं की गरिमा और समानता से समझौता करने वाली किसी भी प्रथा पर न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना ही होगा। यह मामला पत्रकार बेनज़ीर हिना की 2022 में दायर जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें तलाक-ए-हसन को तर्कहीन, मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 25 का उल्लंघन करार दिया गया है। याचिका में तलाक की धर्म-निरपेक्ष और लिंग-निरपेक्ष प्रक्रिया तय करने की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता के पति ने कथित रूप से दहेज न मिलने पर वकील के माध्यम से तलाक-ए-हसन नोटिस भेजा था और बाद में दूसरी शादी भी कर ली।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले में तत्काल तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। अब तलाक-ए-हसन की बारी है, जिसे कई विशेषज्ञ भेदभावपूर्ण बताते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल कुमार सिंह श्रीनेत का कहना है कि कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों से साफ संकेत मिल रहे हैं कि यह कुप्रथा अब खत्म होने की ओर बढ़ रही है।

