नई दिल्ली, 11 दिसम्बर (अशोक “अश्क”) महिला जननांग विकृति (FGM) को चुनौती देने वाली एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए साफ संकेत दे दिया है कि यह संवेदनशील मुद्दा अब निर्णायक मोड़ लेने वाला है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की पीठ के समक्ष दायर यह याचिका दावा करती है कि खतना या खफद की प्रथा न केवल अमानवीय और भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह नाबालिग लड़कियों के मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन भी है।

चेतना वेलफेयर सोसाइटी की ओर से दाखिल याचिका में अदालत से बाध्यकारी दिशानिर्देश बनाने की अपील करते हुए कहा गया है कि लगभग सात वर्ष की आयु की लड़कियों के क्लाइटोरल हुड का एक हिस्सा काट दिया जाता है, जिसे कुछ समुदाय ‘तहारत’ यानी पवित्रता से जोड़ते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि न तो कुरान में इस प्रथा का कोई औचित्य है और न ही इसे इस्लाम में अनिवार्य बताया गया है, फिर भी दाऊदी बोहरा समुदाय में यह 500 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही है।याचिका के अनुसार यह प्रथा अनुच्छेद 14, 15 और 21 का सीधा उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक केएस पुट्टास्वामी फैसले का हवाला देते हुए यह कहा गया है कि निजता, शारीरिक अखंडता और निर्णय लेने की स्वायत्तता संवैधानिक रूप से संरक्षित हैं, जिनका हनन किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता।एडवोकेट अनिल कुमार सिंह श्रीनेत के मुताबिक, “यह प्रथा नहीं, कुप्रथा है। भारत में इसके खिलाफ कोई विशेष कानून न होने से यह बिना जवाबदेही के जारी है।” याचिका में WHO और संयुक्त राष्ट्र के उन वैश्विक मानकों का हवाला दिया गया है जिनमें FGM को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन माना गया है।2017 में NGO साहियो की रिपोर्ट ने भारत में FGM के व्यापक प्रचलन का खुलासा किया था, खासकर दाऊदी बोहरा समुदाय में। अनुमान है कि समुदाय की लगभग 75 प्रतिशत महिलाएं अपनी बेटियों के साथ यह प्रक्रिया करवाती हैं।गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही तलाक-ए-हसन पर रोक के संकेत दे चुका है और कहा है कि यदि कोई प्रथा घोर भेदभावपूर्ण हो, तो न्यायालय को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा। अब निगाहें उच्चतम न्यायालय पर टिकी हैं कि क्या वह ‘खतना’ की इस परंपरा पर निर्णायक रोक लगाने का ऐतिहासिक फैसला सुनाएगा।

