नई दिल्ली, 1 सितम्बर (अशोक “अश्क”) सरकार की पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की योजना (ईबीपी-20) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस नीति के कारण लाखों वाहन मालिकों को उनके वाहन के लिए उपयुक्त ईंधन से वंचित किया जा रहा है, जिससे वाहनों के इंजन और अन्य यांत्रिक हिस्सों को नुकसान पहुंचने का खतरा है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई सोमवार को इस याचिका पर सुनवाई कर सकते हैं।

याचिका दायर करने वाले वकील अक्षय मल्होत्रा ने तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय से मांग की है कि सभी पेट्रोल पंपों पर एथेनॉल मुक्त ईंधन भी उपलब्ध कराया जाए, ताकि वाहन मालिकों के पास विकल्प मौजूद रहे। साथ ही याचिका में यह भी कहा गया है कि 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के उपयोग से जो गैर-अनुपालन वाले वाहनों को होने वाले नुकसान और उनके यांत्रिक क्षरण के व्यापक प्रभाव हैं, उनका अध्ययन कराया जाए।
याचिका में यह बताया गया है कि 2023 से पहले निर्मित वाहन और कुछ बीएस-6 मॉडल भी उच्च एथेनॉल वाले ईंधन के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इसके बावजूद वाहन मालिकों को जबरन ऐसा ईंधन लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है, जो उनके वाहनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। याचिका में यह भी आग्रह किया गया है कि पेट्रोल पंपों पर ईंधन भरवाने से पहले लोगों को इस बात से सचेत किया जाए कि यह ईंधन उनके वाहन के लिए सही है या नहीं, ताकि वाहन मालिक अपनी गाड़ी की सुरक्षा कर सकें।
याचिका में कहा गया है कि उच्च एथेनॉल मिश्रित ईंधन से इंजन में क्षरण, ईंधन की प्रभावशीलता में कमी और मरम्मत खर्च में वृद्धि हो रही है। इसके साथ ही बताया गया है कि इंश्योरेंस कंपनियां ऐसे दावों को खारिज कर रही हैं, जिससे वाहन मालिक आर्थिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
अक्षय मल्होत्रा ने अंतरराष्ट्रीय तुलना करते हुए कहा कि अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में पेट्रोल पंपों पर साफ-साफ लिखा होता है कि ईंधन में कितना एथेनॉल मिला है, और वहां एथेनॉल मुक्त ईंधन भी उपलब्ध होता है। लेकिन भारत में इस तरह की पारदर्शिता नहीं है, जिससे वाहन मालिकों के लिए सही विकल्प चुनना कठिन हो रहा है।
इस याचिका से सरकार की एथेनॉल मिश्रण योजना की दिशा और उसके प्रभावों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने की उम्मीद है, जो देश के लाखों वाहन मालिकों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।

