नई दिल्ली, 1 सितम्बर (अशोक “अश्क”) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सात साल के अंतराल के बाद शनिवार को दो दिवसीय शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के वार्षिक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन पहुंच गए हैं। रविवार को तियानजिन में आयोजित इस सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से महत्वपूर्ण वार्ता की। बातचीत में मोदी ने सीमा पार आतंकवाद और सीमा विवाद के समाधान पर भारत-चीन सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

पीएम मोदी और शी जिनपिंग की यह बैठक भारत-चीन संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है, खासकर जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बताया कि दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाने और संतुलित करने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया। मिसरी ने मीडिया से बातचीत में कहा, “सीमा पर स्थिति का द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए सीमा पर शांति और सौहार्द बनाए रखना हमारे लिए ‘बीमा पॉलिसी’ जैसा है।” उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति जिनपिंग को सीमा विवाद पर भारत का रुख स्पष्ट किया और इस पर कायम रहने का भरोसा दिया।
मिसरी के अनुसार, वार्ता में पिछले वर्ष सैनिकों की सफल वापसी और सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति बनाए रखने पर भी चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने मौजूदा तंत्रों का उपयोग करते हुए सीमा पर शांति कायम रखने और भविष्य में संबंधों में किसी भी प्रकार के व्यवधान से बचने की सहमति जताई।
वहीं, प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा को लेकर कांग्रेस ने भी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने पीएम मोदी से सवाल किया कि क्या भारतीय सैनिक अब स्वतंत्र रूप से भारत-चीन सीमा के पास गश्त कर पा रहे हैं या नहीं। उन्होंने गलवान घाटी में जून 2020 के चीनी आक्रमण के बाद सरकार की कार्रवाई को लेकर चिंता व्यक्त की।
पवन खेड़ा ने कहा, “‘मेरे प्यारे दोस्त डोनाल्ड ट्रंप’ के बाद अब ‘मेरे प्यारे दोस्त शी जिनपिंग’ हैं। हमें बताइए कि गलवान घाटी में क्या न्याय मिला? क्या अप्रैल 2020 से पहले जहां हमारी सेनाएं गश्त करती थीं, वहां अब भी वे जा पा रही हैं? क्या प्रधानमंत्री को इन सवालों के जवाब मिलेंगे?” उन्होंने यह भी कहा कि देश की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति की वर्तमान हालत चिंताजनक है।
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा और शी जिनपिंग के साथ हुई चर्चा न केवल भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे दोनों देशों के आर्थिक और राजनीतिक रिश्तों में भी सुधार की उम्मीद है। भारत-चीन संबंधों के लिहाज से यह दौर काफी संवेदनशील है और दोनों पक्षों की इस वार्ता से भविष्य के द्विपक्षीय संबंधों की दिशा स्पष्ट होगी।

