पटना 29 अगस्त (अशोक “अश्क”) बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले स्पेशल इंटेसिव रिवीजन (SIR) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। चुनाव आयोग की इस विशेष मुहिम को लेकर विपक्षी पार्टियां लगातार विरोध जता रही हैं। इसी बीच अब चुनाव आयोग ने करीब तीन लाख वोटरों को नोटिस भेजा है, जिसमें उनके दस्तावेजों में गड़बड़ी या दस्तावेजों की अनुपस्थिति का हवाला दिया गया है।

चुनाव आयोग ने नोटिस में कहा है कि जिन वोटरों को यह पत्र भेजा गया है, उनके दस्तावेजों में विसंगतियां हैं या फिर उन्होंने जरूरी कागजात दिए ही नहीं हैं। इन सभी को सात दिनों का समय दिया गया है, जिसके भीतर उन्हें जवाब देना अनिवार्य होगा। आयोग ने स्पष्ट किया है कि बिना पक्ष सुने या उचित सफाई मिले बिना किसी का नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा।
रविवार को जारी बयान में चुनाव आयोग ने बताया कि अब तक 98.2% मतदाताओं ने अपने दस्तावेज जमा किए हैं। लेकिन ERO (Electoral Registration Officer) की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ ऐसे नाम सामने आए हैं जिनकी नागरिकता पर संदेह है या फिर जिन्होंने गलत या अपूर्ण दस्तावेज जमा किए हैं।
नोटिस में साफ तौर पर लिखा गया है कि, “आपके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान ऐसा प्रतीत होता है कि आपके दस्तावेजों में विसंगतियां हैं, जिससे आपके मतदाता बनने के अधिकार पर संदेह उत्पन्न होता है।”
SIR प्रक्रिया के तहत 24 जून तक बिहार में 7.89 करोड़ रजिस्टर्ड वोटर थे। 25 जुलाई तक दस्तावेज जमा करने की अंतिम तारीख थी। आयोग को अब तक 7.24 करोड़ फॉर्म प्राप्त हुए हैं, जबकि 65 लाख नाम उन वोटरों के हटाए गए हैं जो मृत पाए गए या राज्य छोड़कर चले गए।
2003 के बाद पहली बार इस तरह की व्यापक समीक्षा प्रक्रिया की जा रही है। चुनाव आयोग के मुताबिक, जिन लोगों के नाम 1 जनवरी 2003 की वोटर लिस्ट में हैं, उन्हें केवल Enumeration Form भरना होगा, कोई दस्तावेज नहीं देना होगा। लेकिन जो लोग 1 जुलाई 1987 से 2 दिसंबर 2004 के बीच जन्मे हैं, उन्हें जन्मतिथि, जन्मस्थान और माता-पिता में से किसी एक की जानकारी के साथ प्रमाण देना होगा।
चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया के जरिए अवैध प्रवासियों को मतदाता सूची से हटाना मुख्य उद्देश्य है, ताकि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव सुनिश्चित किया जा सके।

