पटना (अशोक “अश्क”) बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान में अभी वक्त है, लेकिन राज्य में राजनीतिक उठापटक और दल-बदल का सिलसिला तेज़ हो गया है। मंगलवार को राजधानी पटना में भारतीय जनता पार्टी में कई बड़े नेताओं ने शामिल होकर सियासी हलचल बढ़ा दी। इसमें सबसे प्रमुख नाम पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि, उनकी पत्नी सुचित्रा सिन्हा और पूर्व IPS अधिकारी आनंद मिश्रा का रहा।

हालांकि, चर्चा का केंद्र नागमणि हैं, जिनका राजनीतिक सफर किसी रोलर कोस्टर राइड से कम नहीं रहा है। वे अब तक एक दर्जन से अधिक पार्टियां बदल चुके हैं। दिलचस्प बात यह है कि नागमणि बिहार के प्रसिद्ध पिछड़ा वर्ग नेता जगदेव प्रसाद के बेटे हैं, जिन्हें बिहार का लेनिन कहा जाता है। राज्य के कई शहरों में आज भी जगदेव प्रसाद की मूर्तियां और स्मारक उनकी लोकप्रियता की गवाही देते हैं।
नागमणि की राजनीति की शुरुआत पिता की पार्टी शोषित समाज दल से हुई थी, लेकिन इसके बाद उन्होंने कांग्रेस, जनता दल, राजद, लोजपा, जदयू, एनसीपी, बीएसपी, आरएलएसपी, AJSU जैसी दर्जनों पार्टियों का दामन थामा। वे पहले भी भाजपा में रह चुके हैं और अब एक बार फिर बीजेपी में वापसी की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने नागमणि को शामिल कर एक स्पष्ट जातीय समीकरण साधने की कोशिश की है। कोइरी समुदाय, जिसकी बिहार में आबादी लगभग 7-8% मानी जाती है, पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति इसके पीछे मानी जा रही है।
नागमणि कुछ समय पहले तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और उपेंद्र कुशवाहाbपर तीखे हमले करते रहे हैं। वे प्रशांत किशोर के समर्थन में भी खुलकर बयान दे चुके हैं। ऐसे में अब उनका भाजपा में लौटना एनडीए के भीतर नए समीकरण तैयार कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नागमणि की वापसी से कोइरी वोटरों का एक हिस्सा भाजपा के पाले में आ सकता है, जो फिलहाल जदयू और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं के साथ माना जाता था। यह स्थिति नीतीश कुमार के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर सकती है, जो स्वयं भी इसी जाति से आते हैं और जिनकी राजनीतिक ताकत पिछड़ा वर्ग के समर्थन से जुड़ी रही है।
नागमणि की एंट्री से जहां भाजपा को जातीय संतुलन साधने में मदद मिल सकती है, वहीं यह देखना दिलचस्प होगा कि वे इस बार कितने दिन पार्टी के साथ टिकते हैं।

