पटना (अशोक “अश्क”) बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए गठबंधन में अंदरूनी विवाद उभरने लगे हैं। मंगलवार, 26 अगस्त को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में राज्य कैबिनेट की बैठक के दौरान डिप्टी सीएम विजय सिन्हा और ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी के बीच एक बार फिर तीखी नोकझोंक हुई। इस विवाद के बाद मंत्रियों को दोनों नेताओं को शांत कराना पड़ा। यह पहली बार नहीं था, जब विजय सिन्हा और अशोक चौधरी के बीच तनाव हुआ है। इससे पहले 36 दिन पहले भी एनडीए विधानमंडल की बैठक में दोनों नेताओं के बीच तकरार हो चुकी थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैबिनेट की बैठक के बाद जब सभी मंत्री बाहर जा रहे थे, तब विजय सिन्हा और अशोक चौधरी फिर से भिड़ गए। दोनों नेताओं के बीच विवाद कृषि विभाग की जमीन को लेकर हुआ। विजय सिन्हा जो कि कृषि मंत्री भी हैं, से अशोक चौधरी ने कॉलेज निर्माण के लिए कृषि विभाग की जमीन हस्तांतरित करने का अनुरोध किया। इस पर विजय सिन्हा ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कृषि विभाग की जमीन के हस्तांतरण पर रोक लगा रखी है, और बिना मुख्यमंत्री के आदेश के वह यह जमीन ट्रांसफर नहीं कर सकते।
सिन्हा ने यह भी कहा कि जब तक विभाग को उतनी ही जमीन किसी दूसरी जगह नहीं मिल जाती, तब तक हस्तांतरण संभव नहीं होगा। इस पर अशोक चौधरी बिफर गए और उन्होंने तंज करते हुए विजय सिन्हा से सवाल किया, “क्या वही हमेशा कृषि मंत्री बने रहेंगे?” इसके बाद दोनों नेताओं के बीच जुबानी हमलों का सिलसिला शुरू हो गया।
यह विवाद इतना बढ़ गया कि अन्य मंत्रियों को बीच-बचाव करना पड़ा और स्थिति को शांत कराना पड़ा। बताया जा रहा है कि जिस जमीन पर विवाद हुआ, उस पर जेडीयू के एक मंत्री के क्षेत्र में कॉलेज निर्माण की योजना है। हालांकि, इस मुद्दे पर आधिकारिक रूप से कोई जानकारी नहीं मिल पाई है।
यह पहला मौका नहीं था, जब विजय सिन्हा और अशोक चौधरी के बीच मतभेद सामने आए हों। 21 जुलाई को बिहार विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान भी एनडीए विधायक दल की बैठक में दोनों नेताओं के बीच तकरार हुई थी। उस बैठक में बीजेपी विधायकों ने अशोक चौधरी के ग्रामीण कार्य विभाग में ग्लोबल टेंडरिंग की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। इसके बाद विजय सिन्हा ने चौधरी को गठबंधन धर्म का पालन करने की नसीहत दी थी।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए के भीतर आपसी मतभेद और तनाव बढ़ता हुआ दिख रहा है। यह घटनाक्रम गठबंधन के भीतर शक्ति संघर्ष और राजनीतिक असहमति को दर्शाता है, जो आगामी चुनावों में और भी गहरे हो सकते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस तनाव का बिहार की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है।

