नई दिल्ली, 8 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर इन दिनों एक बड़ी प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत दौरे पर हैं। करीब सवा सौ लोगों की टीम के साथ भारत पहुंचे स्टार्मर का यह दौरा रणनीतिक साझेदारी और व्यापारिक सहयोग को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। इसी बीच सिंगापुर के पूर्व वरिष्ठ राजनयिक और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिकार किशोर महबूबानी का बयान वैश्विक राजनीति में हलचल मचा रहा है।

दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान महबूबानी ने कहा, “अब समय आ गया है कि यूनाइटेड किंगडम (UK) अपनी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सीट भारत को सौंप दे।” उन्होंने कहा कि यह सीट उन शक्तियों के लिए बनाई गई थी जो आज वैश्विक प्रभाव रखती हैं, न कि उन देशों के लिए जिनका प्रभाव अतीत में रहा है।
महबूबानी, जो संयुक्त राष्ट्र में सिंगापुर के स्थायी प्रतिनिधि रह चुके हैं, ने ब्रिटेन की मौजूदा वैश्विक स्थिति की तुलना भारत के बढ़ते प्रभाव से की। उन्होंने कहा कि भारत न केवल दुनिया की टॉप-5 अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, बल्कि ग्लोबल साउथ की भी मजबूत आवाज बनकर उभरा है। उनके अनुसार, “आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक राजनीति में तीसरा ध्रुव बनेगा और अमेरिका-चीन के बीच संतुलन साधेगा।”
भारत लंबे समय से UNSC में सुधार की मांग करता आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मुद्दा उठाया है कि मौजूदा UNSC संरचना 1945 की शक्ति-संतुलन पर आधारित है, जबकि आज की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। भारत का यह भी तर्क है कि वह न सिर्फ सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में सबसे बड़ा योगदानकर्ता भी है।
हालांकि भारत को अमेरिका, फ्रांस, रूस और ब्रिटेन जैसे देशों का समर्थन मिला है, लेकिन चीन और कुछ यूरोपीय देशों का रुख अब तक स्पष्ट नहीं है। भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील मिलकर G4 गठबंधन के तहत UNSC में सुधार की मांग कर रहे हैं।
वर्तमान UNSC में 15 सदस्य हैं, जिनमें से 5 स्थायी और 10 अस्थायी हैं। स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन को वीटो पावर प्राप्त है। लेकिन हाल के वर्षों में वैश्विक संघर्षों और सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए UNSC की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं। भारत कई बार कह चुका है कि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो यह संस्था अपनी प्रासंगिकता खो देगी।

