नई दिल्ली, 14 नवम्बर (अशोक “अश्क”) भारत ने अपने सैन्य इतिहास में एक नया और साहसिक अध्याय जोड़ा, जब गुजरात के माधवपुर बीच पर आयोजित ‘एक्सरसाइज त्रिशूल’ के दौरान भारतीय सेना के टैंक पहली बार सीधे समुद्र से उतारे गए। समुद्री लहरों और बख़्तरबंद टैंकों की दहाड़ के इस अनोखे संगम ने स्पष्ट संदेश दिया कि भारतीय थलसेना अब केवल ज़मीन तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्र को भी एक नई युद्धभूमि के रूप में अपना चुकी है। यह अभ्यास भारत की विकसित होती सैन्य रणनीति और बदलते भू-राजनीतिक परिवेश में बढ़ती सामरिक क्षमता का सशक्त प्रतीक बना।

लैंडिंग क्राफ्ट मैकेनाइज़्ड (LCM) के माध्यम से भारी टैंक और एक इन्फैंट्री प्लाटून को सीधे समुद्र से तट पर उतारने में मिली सफलता इस बात का प्रमाण है कि भारतीय सेना अब तटीय इलाकों में तेज़, अप्रत्याशित और निर्णायक ऑपरेशन चलाने की स्थिति में पहुँच चुकी है। यह क्षमता विशेष रूप से पाकिस्तान जैसे विरोधी देशों के लिए रणनीतिक चुनौती पैदा करती है, जिसका प्रमुख सामरिक और आर्थिक केंद्र कराची समुद्री तट के बिल्कुल पास है।
अभ्यास की समीक्षा लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ, वाइस एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन और एयर मार्शल नागेश कपूर ने संयुक्त रूप से की। लेफ्टिनेंट जनरल सेठ ने कहा कि भारतीय सेना किसी भी चुनौती—चाहे रेगिस्तान, रण या क्रीक का इलाका हो—का सामना करने के लिए तैयार है। उनका यह बयान इस बात का संकेत है कि भारतीय सेना मल्टी-टेरेन और मल्टी-डोमेन वॉरफेयर की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुकी है।
समुद्र में नौसेना की मौजूदगी, हवा में वायुसेना की निगरानी और तट पर सेना के टैंकों की शक्ति के इस संयुक्त स्वरूप ने ‘त्रिशूल’ को एक अभूतपूर्व सैन्य अभ्यास बना दिया। पाकिस्तान में भी अब चर्चाएँ तेज़ हैं कि समुद्र से भारी भारतीय टैंकों की उतरने की क्षमता कराची की सुरक्षा पर क्या असर डालेगी।
‘त्रिशूल’ ने साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुरूप भारत अब सीमाओं से आगे बढ़कर समुद्री आयामों को भी निर्णायक शक्ति में बदल रहा है—और यदि परिस्थिति मांगें, तो समुद्र भारतीय टैंकों के लिए बाधा नहीं, बल्कि एक नया आक्रामक मार्ग बन सकता है।

