नई दिल्ली, 24 नवम्बर (अशोक “अश्क”) देश के पूर्व चीफ जस्टिस बी.आर. गवई रविवार को सेवानिवृत्त हो गए और सोमवार को जस्टिस सूर्यकांत ने भारत के 51वें चीफ जस्टिस के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति भवन में आयोजित भव्य समारोह के दौरान जस्टिस गवई अपने आधिकारिक वाहन से पहुंचे, लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वे सरकारी गाड़ी का उपयोग किए बिना अपने निजी वाहन से आवास लौटे।

उन्होंने सीजेआई के लिए निर्धारित आधिकारिक गाड़ी अपने उत्तराधिकारी को ही छोड़ दी। उनके इस कदम को न्यायपालिका की पारदर्शिता और नैतिक आचरण की दिशा में एक मजबूत संदेश माना जा रहा है।
पिछले कुछ समय से न्यायपालिका की साख को लेकर उठ रहे सवालों के बीच गवई का यह व्यवहार विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कुछ महीने पहले पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ के रिटायरमेंट के बाद भी सीजेआई आवास में बने रहने को लेकर विवाद सामने आया था, जिसकी उन्होंने अपनी परिस्थितियों के आधार पर स्पष्टीकरण दिया था। इस पृष्ठभूमि में जस्टिस गवई का निर्णय एक सकारात्मक उदाहरण माना जा रहा है।
दलित समुदाय से आने वाले जस्टिस गवई देश के दूसरे दलित सीजेआई रहे। सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में अपनी अंतिम सुनवाई के बाद उन्होंने कहा था कि विधेयकों की मंजूरी को लेकर राज्यपालों और राष्ट्रपति पर समयसीमा लागू न करने का फैसला संविधानसम्मत है, क्योंकि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते।
20 नवंबर को गवई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा था कि राज्यपालों द्वारा अत्यधिक विलंब की सीमित न्यायिक समीक्षा संभव रहेगी। उन्होंने यशवंत वर्मा मामले पर टिप्पणी से यह कहते हुए इनकार किया कि मामला वर्तमान में संसदीय समिति के विचाराधीन है।

