
पटना, 10 जनवरी (पटना डेस्क) बिहार का मुंगेर कभी देश-दुनिया में गन फैक्ट्रियों के लिए जाना जाता था। सदियों पुरानी कारीगरी, पीढ़ियों से चला आ रहा हुनर और हथियार निर्माण की अलग पहचान—यही मुंगेर की शान थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों में सख्त लाइसेंसिंग नियमों और अवैध हथियारों के बढ़ते कारोबार ने इस शहर की चमक फीकी कर दी। अब वही मुंगेर एक बार फिर सुर्खियों में है, इस बार डिफेंस कॉरिडोर के बड़े ऐलान के साथ।मुंगेर ज़िले में मौजूद हथियार फैक्ट्रियां भारत की सबसे पुरानी यूनिट्स में से हैं, जिनकी स्थापना 1762 में औपनिवेशिक दौर में हुई थी।

समय के साथ यह इलाका ब्रीच-लोडिंग फायरआर्म्स का बड़ा केंद्र बन गया। अपने सुनहरे दौर में यहां करीब 1,500 परिवारों को रोज़गार मिला करता था। बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी की लगभग आठ एकड़ ज़मीन पर 37 प्राइवेट गन फैक्ट्रियां संचालित थीं, जिन्होंने अकेले 2001 में 2-3 करोड़ रुपये की एक्साइज ड्यूटी दी।हालांकि 2016 में आर्म्स लाइसेंसिंग पॉलिसी बदली और सिविलियन हथियारों की सीमा घटाई गई। साथ ही देसी कट्टों के समानांतर अवैध उत्पादन ने वैध फैक्ट्रियों की कमर तोड़ दी। नतीजा यह हुआ कि जहां कभी हर हफ्ते 1,000 से 1,200 मज़दूर काम करते थे, आज उनकी संख्या सिमटकर 150 के आसपास रह गई। कई कारीगरों को राजमिस्त्री या ऑटो चालक बनना पड़ा।

अब नई उम्मीद जगी है। बिहार के गृह मंत्री सम्राट चौधरी के मुताबिक, राज्य कैबिनेट ने मुंगेर को डिफेंस कॉरिडोर और टेक हब के रूप में विकसित करने की मंज़ूरी दे दी है। इस कॉरिडोर में हथियार, गोला-बारूद, बुलेटप्रूफ जैकेट, हेलमेट, बॉडी आर्मर और नाइट विज़न डिवाइस जैसे अत्याधुनिक डिफेंस इक्विपमेंट बनाए जाएंगे। इससे न सिर्फ मुंगेर की खोई पहचान लौटेगी, बल्कि बड़े पैमाने पर रोज़गार भी पैदा होगा।मुंगेर गन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन का कहना है कि यहां के कारीगर आज भी किसी से कम नहीं हैं। अगर सरकार का वादा ज़मीन पर उतरा, तो मुंगेर एक बार फिर भारत के डिफेंस मैप पर दमदार वापसी करेगा।

