मां के जनाज़े के आगे रोता रहा 8 साल का मासूम, फिर खुद ही उठाकर पहुंचाया पोस्टमार्टम हाउस, रिश्तों व समाज पर सवाल छोड़ गई ये तस्वीर

नई दिल्ली, 17 जनवरी (सेंट्रल डेस्क) उत्तर प्रदेश के एटा जिले से सामने आई यह कहानी किसी एक बच्चे की नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनहीनता का आईना है। एक ऐसा मंजर,जिसे देखने वाला हर शख्स भीतर तक कांप गया। जहां एक 8 साल का मासूम अपनी मां के शव के पास बैठा फूट-फूटकर रो रहा था… न कोई रिश्तेदार, न कोई सहारा, न कोई हाथ थामने वाला। जिस उम्र में इस बच्चे के कंधों पर स्कूल का बस्ता होना चाहिए था, उसी उम्र में नियति ने उसकी गोद में मां का निर्जीव शरीर रख दिया। न पिता का साया, न अपनों का साथ यह दर्दनाक मामला जैथरा थाना क्षेत्र के नगला धीरज गांव का है। गांव की 45 वर्षीय नीलम लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। उनका इलाज एटा स्थित वीरांगना अवंतीबाई मेडिकल कॉलेज में चल रहा था,जहां इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।

नीलम की मौत के बाद न तो कोई रिश्तेदार आया,न कोई पड़ोसी आगे बढ़ा। अस्पताल के एक कोने में बस बैठा एक आठ साल का बच्चा—अपनी मां के शव से लिपटकर रोता रहा। मासूम ने बताया कि करीब एक साल पहले उसके पिता की HIV के कारण मौत हो चुकी थी। पिता के जाते ही रिश्तेदारों ने सहारा देने के बजाय संपत्ति पर नजरें गड़ा लीं। मां बीमार थी और बेटा… अकेला।-जब 8 साल का बच्चा बन गया मां का सहारायह मासूम अपनी मां के लिए सिर्फ बेटा नहीं, बल्कि पूरा परिवार बन गया था। फर्रुखाबाद के लोहिया अस्पताल से लेकर कानपुर के हैलट अस्पताल और फिर दिल्ली तक—इस नन्हे बच्चे ने अपनी बीमार मां को बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाईं। बीते आठ दिनों से वह एटा मेडिकल कॉलेज में मां की सेवा में दिन-रात लगा रहा। कभी दवाइयां लाता, कभी डॉक्टरों के चक्कर काटता, तो कभी मां का सिर अपनी गोद में रखकर उसे दिलासा देता रहा।

लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।-मां की मौत के बाद भी नहीं आया कोई अपनानीलम की मौत के बाद सबसे ज्यादा झकझोर देने वाला दृश्य तब सामने आया, जब कोई भी व्यक्ति शव को पोस्टमार्टम हाउस तक ले जाने नहीं आया। तब उस मासूम ने खुद हिम्मत जुटाई और मां के शव को लेकर जिला मुख्यालय पहुंच गया।एक आठ साल का बच्चा,जो खुद सहारे का मोहताज था,आज अपनी मां का अंतिम सहारा बन गया।यह सिर्फ एक खबर नहीं,एक सवाल है,यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज से पूछा गया एक कड़वा सवाल है। क्या हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि एक बच्चे को उसकी मां के जनाज़े के साथ अकेला छोड़ दें?एटा की यह कहानी आंखें नम कर जाती है… और दिल को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि अगर समाज साथ न दे,तो मासूम भी वक्त से पहले बड़ा हो जाता है।

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