
पटना, 23 जनवरी (पटना डेस्क) दरभंगा में राजशाही परंपराओं की भव्य झलक एक बार फिर देखने को मिली, जब दरभंगा महाराज की तीसरी पत्नी और अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का श्राद्ध पूरे विधि-विधान और शाही ठाठ-बाट के साथ संपन्न कराया गया। इस विशेष श्राद्ध कर्म का आयोजन महारानी के पौत्र युवराज कपिलेश्वर सिंह और राजेश्वर सिंह की ओर से किया गया, जिसमें परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम नजर आया।श्राद्ध कर्म के लिए मधुबनी जिले के जितवारपुर गांव से 15 विद्वान ब्राह्मणों की टोली को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था।

सभी ब्राह्मणों ने सामूहिक रूप से वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्राद्ध संपन्न कराया। राज परिवार की ओर से ब्राह्मणों को दान स्वरूप टीवी, फ्रिज, कूलर, एसी जैसे आधुनिक उपकरणों के साथ चांदी की थाली, बिस्किट, चम्मच, ग्लास और कटोरी भेंट की गई, जिसने आयोजन को खास बना दिया।दरभंगा राज परिवार का इतिहास संपत्ति प्रबंधन को लेकर भी चर्चा में रहा है। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने 5 जुलाई 1961 को अपनी संपत्ति की देखरेख के लिए वसीयत तैयार कराई थी। इसमें पहली महारानी राजलक्ष्मी और तीसरी महारानी कामसुंदरी देवी को अधिकार से अलग रखते हुए गिरीद मोहन मिश्र और न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत झा को एग्जीक्यूटर नियुक्त किया गया था। तीनों महारानियों से संतान नहीं होने के कारण यह व्यवस्था की गई थी, जबकि दूसरी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन महाराज के जीवनकाल में ही हो गया था।

न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत झा के 3 मार्च 1978 को निधन के बाद कोलकाता हाईकोर्ट ने न्यायमूर्ति एस. ए. मसूद और शिशिर कुमार मुखर्जी को प्रशासक नियुक्त किया। उनकी देखरेख में दस्तावेज तैयार हुए और अंततः 15 अक्टूबर 1987 को सर्वोच्च न्यायालय की मुहर के बाद संपत्ति का बंटवारा किया गया, जिसमें जनहित के लिए भी हिस्सा सुरक्षित रखा गया।

