
पटना, 25 जनवरी (पटना डेस्क) बिहार की राजनीति में सादगी, ईमानदारी और सिद्धांतों की मिसाल माने जाने वाले कर्पूरी ठाकुर आज भी जननायक के रूप में याद किए जाते हैं। दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे कर्पूरी ठाकुर सत्ता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद आम आदमी की तरह जीवन जीते रहे। पटना की सड़कों पर मैला कुर्ता, हवाई चप्पल और रिक्शे की सवारी करते उन्हें कई बार देखा गया। हैरानी की बात यह रही कि मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनके पास न अपनी कोई गाड़ी थी और न ही पटना में निजी जमीन।

अनुरंजन झा अपनी पुस्तक में उल्लेख करते हैं कि 1970 के दशक में बिहार सरकार ने पटना में विधायकों और पूर्व विधायकों को निजी आवास के लिए सस्ती दर पर जमीन देने का निर्णय लिया था। कर्पूरी ठाकुर ने अपने दल के नेताओं से कहा कि वे इस सुविधा का लाभ लें और अधिकांश को जमीन भी दिलवाई, लेकिन खुद के लिए एक इंच जमीन लेने से इनकार कर दिया। जब सहयोगियों ने उनसे आग्रह किया कि परिवार और बच्चों के भविष्य के लिए जमीन ले लें, तो उन्होंने साफ कहा—“कुछ नहीं करेगा तो गांव में रहेगा।”यही नहीं, उसी दौर में उनके शिष्य लालू प्रसाद राजनीति की सीढ़ियां चढ़ रहे थे। कर्पूरी ठाकुर लालू प्रसाद के प्रति स्नेह रखते थे और उन्हें आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

लालू प्रसाद भी अपने गुरु का गहरा सम्मान करते थे। सांसद बनने के बाद लालू प्रसाद ने विलीज की एक सेकेंड हैंड जीप खरीदी और उसी से चलना शुरू किया, जो उस समय की सादगी का प्रतीक थी।कर्पूरी ठाकुर की यह जीवनशैली आज की राजनीति के लिए एक आईना है, जहां सत्ता और संपत्ति अक्सर साथ-साथ चलती नजर आती है। उनकी सादगी, त्याग और मूल्यनिष्ठ राजनीति आज भी लोगों को प्रेरणा देती है।

