बुलडोजर जस्टिस’ पर CJI का बड़ा बयान: बिना कानूनी प्रक्रिया के मकान गिराना असंवैधानिक, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि

पणजी (अशोक “अश्क”) भारत के प्रधान न्यायाधीश (CJI) जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ के बाद अब सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को लेकर बड़ा बयान दिया है। एक न्यूज एजेंसी से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की गहरी संतुष्टि है कि देश की सर्वोच्च अदालत ने बिना कानूनी प्रक्रिया के नागरिकों के घरों को गिराए जाने की घटनाओं पर रोक लगाकर संविधान में प्रदत्त नागरिक अधिकारों की रक्षा की है।


सीजेआई गवई शनिवार को पणजी में गोवा हाई कोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट की उस ऐतिहासिक बेंच के फैसले का जिक्र किया, जिसका हिस्सा वे स्वयं थे। यह वही बेंच थी जिसने पिछले वर्ष ‘बुलडोजर जस्टिस’ के मामलों पर संज्ञान लेते हुए पूरे देश के लिए स्पष्ट गाइडलाइंस जारी की थी और कार्यपालिका द्वारा बिना सुनवाई के संपत्तियों को गिराए जाने पर रोक लगाई थी।
सीजेआई गवई ने कहा, “मुझे वास्तव में खुशी है कि संविधान के संरक्षक के रूप में हम उन नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सके, जिनके घर बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्त कर दिए गए थे।” उन्होंने कहा कि कई मामलों में जिन लोगों पर मुकदमा तक नहीं चला, या जो सिर्फ आरोपी थे, उनके घर बिना न्यायिक प्रक्रिया के गिरा दिए गए। यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि नैतिक और संवैधानिक मूल्यों के भी खिलाफ है।
जस्टिस गवई ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का घर केवल उसका नहीं होता, उसमें उसके परिवार के अन्य सदस्य भी रहते हैं, जो निर्दोष होते हैं और फिर भी उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। उन्होंने कहा, “अगर किसी को दोषी भी ठहराया गया है, तब भी वह कानून के तहत समान अधिकारों का पात्र है। देश में कानून का शासन सर्वोच्च है और यही संविधान की आत्मा है।”
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने यह सुनिश्चित किया कि कार्यपालिका न्यायपालिका की भूमिका न निभाए। एक अन्य खबर के मुताबिक सीजेआई गवई ने कहा कि भारत का संविधान कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का स्पष्ट विभाजन करता है। इस व्यवस्था को संतुलित रखना लोकतंत्र की बुनियाद है।
“अगर कार्यपालिका को जज बनने की अनुमति दी गई, तो यह शक्ति के विभाजन के मूल सिद्धांत को चोट पहुंचाएगा। हमें इस बात की खुशी है कि हमने कार्यपालिका की सीमाओं को स्पष्ट कर न्याय का मार्ग प्रशस्त किया,” उन्होंने कहा।
सीजेआई गवई के इस बयान को देश में न्यायिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की दिशा में एक मजबूत संदेश माना जा रहा है। यह बयान न केवल संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी निभाने का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका सत्ता के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने के लिए पूरी तरह सतर्क है।

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