गया में पितृपक्ष मेले से पहले “ई-पिंडदान” पर विवाद, गयापाल पंडा समाज ने जताया कड़ा विरोध

गया 27 अगस्त ( अशोक “अश्क”) विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला इस वर्ष 6 सितंबर से बिहार के गया जी में शुरू होने जा रहा है। इसे लेकर जिला प्रशासन तैयारियों में जुटा है। पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों का पिंडदान करने गया पहुंचते हैं। लेकिन इस बार पिंडदान शुरू होने से पहले ही ई-पिंडदान योजना को लेकर विवाद गहरा गया है।


पिछले तीन वर्षों से राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई ई-पिंडदान सेवा उन लोगों के लिए वरदान साबित हुई थी जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं या विदेशों में रहते हैं और गया नहीं आ सकते। लेकिन इस बार गयापाल पंडा समाज ने इस सेवा का कड़ा विरोध शुरू कर दिया है।
गयापाल पंडा समाज का कहना है कि पिंडदान एक गहरी धार्मिक प्रक्रिया है, जिसमें श्रद्धालु की स्वयं की उपस्थिति और पंडा द्वारा विधिवत कर्मकांड जरूरी होता है। उनका कहना है कि “मोक्ष की प्राप्ति तभी संभव है जब श्रद्धालु अपने पूर्वजों के प्रति सच्ची भावना से, गया पहुंचकर कर्म करें। ऑनलाइन माध्यम से यह प्रक्रिया अधूरी रह जाती है।”
विष्णुपद मंदिर प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष शंभु लाल विट्ठल ने कहा, “ई-पिंडदान से श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है और स्थानीय पंडा समाज की आजीविका पर भी असर पड़ता है। यह केवल धर्म का प्रश्न नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और जीविका का भी मामला है।”
ई-पिंडदान योजना बिहार सरकार की एक डिजिटल पहल है, जिसे बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम संचालित करता है। इसके तहत 23,000 रुपये में श्रद्धालु ऑनलाइन बुकिंग कराकर गया में पिंडदान करा सकते हैं।
इसमें विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट, और फल्गु नदी में पिंडदान कराया जाता है, और पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी श्रद्धालुओं को भेजी जाती है।
BSTDC का कहना है कि यह सेवा पारदर्शी, सुरक्षित और सुविधाजनक है, खासकर उन लोगों के लिए जो किसी कारणवश गया नहीं आ सकते।
गया के पंडा समाज का आरोप है कि सरकार धार्मिक कर्मकांड को भी व्यापार बना रही है। शंभु लाल विट्ठल ने कहा, “हमें ब्राह्मण परंपरा से जो अधिकार मिले हैं, हम केवल उसी के अनुसार दक्षिणा लेते हैं। लेकिन अब सरकार और कथावाचकों ने भी इसमें दखल देना शुरू कर दिया है। ये धार्मिक क्षेत्र का व्यवसायीकरण है।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गया के विधायक डॉ. प्रेम कुमार जैसे जनप्रतिनिधियों को इस मुद्दे पर विधानसभा में आवाज उठानी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने भी चुप्पी साध रखी है।
हालांकि, कुछ पंडित और श्रद्धालु ई-पिंडदान का समर्थन भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि तकनीक के माध्यम से अब वो लोग भी पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर पा रहे हैं जो पहले असमर्थ थे।
अब देखना यह है कि सरकार धार्मिक परंपरा और आधुनिक सुविधा के बीच कैसे संतुलन बनाती है और इस विवाद का समाधान कैसे निकाला जाता है। पितृपक्ष मेले से पहले यह मुद्दा काफी गरमा गया है और इसके असर से मेला भी अछूता नहीं रहेगा।

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