थानों में जब्त वाहनों का बढ़ता ढेर बना गंभीर समस्या, सड़ रहे लाखों के वाहन, सरकार को करोड़ों के राजस्व का नुकसान

समस्तीपुर 27 अगस्त (अशोक “अश्क”) जिले में थानों के परिसर अब कबाड़खाने में तब्दील होते जा रहे हैं। जिले के विभिन्न 35 थानों में वर्षों से जब्त वाहनों का अंबार लगा हुआ है। हजारों की संख्या में बाइक, ऑटो और चारपहिया वाहन थानों में धूल-धक्कड़ खाते खड़े हैं। नतीजतन, ये वाहन धीरे-धीरे सड़कर कबाड़ बनते जा रहे हैं और इनमें से कई तो कबाड़ के लायक भी नहीं बचे हैं। अनुमान है कि जिलेभर में ऐसे जब्त वाहनों की संख्या 5,000 से अधिक है, जिनमें करीब 80 प्रतिशत दोपहिया वाहन हैं।


थानों के परिसरों में जगह की भारी कमी के चलते कई स्थानों पर गाड़ियों को एक-दूसरे के ऊपर रखा गया है। कई थानों में तो इन्हें गड्ढों में फेंककर एक के ऊपर एक रख दिया गया है, जिससे इनके रखरखाव की कोई व्यवस्था नहीं हो पाती। इन पर वर्षों से जंग लग चुकी है और इंजन, टायर समेत अन्य पुर्जे पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इस कारण वे अब न तो उपयोगी बचे हैं और न ही नीलामी लायक।
यह स्थिति न सिर्फ थानों की साफ-सफाई और कार्यक्षमता को प्रभावित कर रही है, बल्कि सरकार को संभावित करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान भी हो रहा है। अगर समय पर इनकी नीलामी की जाती, तो राज्य को भारी राजस्व प्राप्त हो सकता था। लेकिन लचर व्यवस्था और कानूनी पेचिदगियों के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है।
थानों में जब्त किए गए ये वाहन अधिकतर सड़क दुर्घटनाओं, अवैध गतिविधियों या लावारिस हालत में बरामद किए गए हैं। नियमानुसार, जबतक किसी वाहन से जुड़ा मामला कोर्ट में लंबित रहता है, तबतक उसकी नीलामी नहीं की जा सकती। पुलिस जब किसी वाहन को जब्त करती है, तो इसे कोर्ट को भी रिपोर्ट करती है, और तबतक यह वाहन पुलिस रिकॉर्ड में मालखाना के रूप में दर्ज रहता है।
स्थिति और भी चिंताजनक तब हो जाती है, जब यह पता चलता है कि कई थानों में अभी तक मालखाना का प्रभार स्पष्ट रूप से थानाध्यक्षों को नहीं सौंपा गया है। इससे यह साफ नहीं हो पाता कि किस थाने में कितने वाहन जब्त हैं। ऐसे में इन वाहनों की सूची, स्थिति और मूल्यांकन को लेकर भी कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं रहती, जिससे नीलामी प्रक्रिया में बाधा आती है।
हालांकि शराब के मामलों में जब्त वाहनों की नीलामी समय-समय पर की जाती है, लेकिन अन्य मामलों में यह प्रक्रिया बिल्कुल ठप है। हजारों वाहन थानों में ऐसे ही वर्षों से सड़ रहे हैं। इनमें से कई वाहन ऐसे हैं जो एक समय पर पूरी तरह से चालू अवस्था में थे, लेकिन अब उनकी हालत इतनी खराब हो गई है कि वे कबाड़ के भाव भी बिकने लायक नहीं रहे।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर प्रशासन चाहे, तो कोर्ट के लंबित मामलों की समीक्षा कर ऐसे वाहनों की पहचान की जा सकती है, जिनकी नीलामी प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। इससे न सिर्फ थानों की जगह खाली होगी, बल्कि राज्य को राजस्व की प्राप्ति भी होगी। इसके अलावा थानों में स्वच्छता और कार्यक्षमता में भी सुधार आएगा।
फिलहाल आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन, न्यायालय और पुलिस विभाग मिलकर एक ठोस योजना बनाएं, ताकि थानों में वर्षों से धूल खा रहे वाहनों को समयबद्ध तरीके से नीलाम

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