हैदराबाद 29 अगस्त (अंकिता राय) बीआईटीएस पिलानी, हैदराबाद कैंपस के शोधकर्ताओं ने जैविक कचरे के निपटान के लिए एक अत्याधुनिक और तेज़ तकनीक विकसित की है, जिसे “सैंडविच एरोबिक एनारोबिक एरोबिक (SAAnA) रिएक्टर” नाम दिया गया है। यह प्रणाली पारंपरिक तकनीकों की तुलना में 60% अधिक तेज़ी से कचरे को संसाधित करती है और साथ ही बायोगैस व जैव उर्वरक के उत्पादन में भी सक्षम है।

इस नवाचार के पीछे बीआईटीएस के BEST लैब के प्रोफेसर शंकर गणेश पलानी और शोधकर्ता डॉ. अतुन रॉय चौधरी हैं। उन्होंने इसे एक “वन-स्टॉप सॉल्यूशन” के रूप में प्रस्तुत किया है, जो नगरपालिका कचरा, बूचड़खाने के अवशेष, लैंडफिल लीचेट और फीकल स्लज जैसी विभिन्न प्रकार की जैविक सामग्री को संसाधित कर सकता है।
कैसे काम करता है SAAnA रिएक्टर:
- एरोबिक प्री-ट्रीटमेंट (5 दिन): इसमें कचरे को ऑक्सीजन देकर उसका विघटन शुरू किया जाता है, जिससे आगे की प्रक्रिया तेज होती है।
- एनारोबिक डाइजेशन: इस चरण में बिना ऑक्सीजन के बायोगैस बनाई जाती है। उत्पन्न गैस का 20% भाग वापस सिस्टम में डालकर उच्च मिथेन वाली बायोगैस प्राप्त होती है।
- एरोबिक पोस्ट-ट्रीटमेंट: बचे हुए डाइजेस्टेट को हवा में रखकर गुणवत्ता युक्त जैव उर्वरक तैयार किया जाता है।
जहां पारंपरिक एनारोबिक तकनीक में 60 दिन लगते हैं, वहीं SAAnA रिएक्टर मात्र 23 दिनों में कचरे को संसाधित कर लेता है। साथ ही, प्रति किलोग्राम वेस्ट से लगभग 0.8 क्यूबिक मीटर बायोगैस भी प्राप्त होती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भारत समेत विश्वभर में कचरा प्रबंधन की दिशा में एक बड़ी क्रांति ला सकती है। इसे शहरी क्षेत्रों, औद्योगिक इकाइयों और नगर निगमों में अपनाया जा सकता है, जिससे स्वच्छ और सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा।
इस तकनीक को भारत सरकार की कपिला योजना के तहत मान्यता प्राप्त हुई है और इसका भारतीय पेटेंट (No. 202411062676) भी दायर किया जा चुका है।

