पटना, 30 अगस्त (अशोक “अश्क”) बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की आहट के साथ ही ऐतिहासिक और रणनीतिक रूप से अहम मगध क्षेत्र में सियासी हलचल तेज हो गई है। प्राचीन भारत के शक्तिशाली साम्राज्य रहे इस इलाके के पांच जिलों – गया, औरंगाबाद, जहानाबाद, अरवल और नवादा की 26 विधानसभा सीटों पर इस बार एनडीए और महागठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।

फिलहाल, इन 26 में से 19 सीटें महागठबंधन के पास हैं जबकि सिर्फ 7 सीटें एनडीए के खाते में हैं। स्थिति यह है कि औरंगाबाद, जहानाबाद और अरवल जैसे जिलों में एनडीए का एक भी विधायक नहीं है। केवल गया जिले में एनडीए को बढ़त हासिल है, जहां उसे 6 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि महागठबंधन ने 4 सीटें जीती थीं।
ऐसे में एनडीए के लिए यह क्षेत्र ‘करो या मरो’ की स्थिति में है। खासकर उन सीटों पर, जहां पिछले चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था, वहां प्रत्याशी बदलने और नई रणनीति पर विचार चल रहा है। एनडीए के घटक दलों – भाजपा, जदयू और हम ने बूथ स्तर पर पकड़ मजबूत करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। नेताओं के दौरों और कार्यकर्ताओं की बैठकें लगातार हो रही हैं।
वहीं, महागठबंधन के लिए अपनी साख बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। पिछले चुनाव में मिली बढ़त को कायम रखना अब आसान नहीं रह गया है, खासकर तब जब जनता के बीच असंतोष और स्थानीय मुद्दों पर सवाल उठने लगे हैं।
इस बीच, चुनावी समर में एक नया खिलाड़ी भी उतरने को तैयार है प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी। मगध क्षेत्र में जन सुराज की सक्रियता तेजी से बढ़ रही है और इसका प्रभाव दोनों बड़े गठबंधनों के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। प्रशांत किशोर के गांव-गांव पदयात्रा और संवाद कार्यक्रमों ने जनता के बीच चर्चा तो जरूर पैदा की है। अब देखना होगा कि यह चर्चा वोटों में कितना बदलती है।
टिकट बंटवारे की प्रक्रिया और चुनाव की आधिकारिक घोषणा के बाद इस क्षेत्र में राजनीतिक घमासान और तेज होगा। स्थानीय नेताओं की सक्रियता, जातीय समीकरण और नए चेहरों की एंट्री से मगध की राजनीति और अधिक दिलचस्प होती जा रही है।
कुल मिलाकर, मगध की 26 सीटें इस बार बिहार चुनाव का निर्णायक मोर्चा बन सकती हैं, जहां हार-जीत से कई बड़े राजनीतिक समीकरण तय होंगे।

