नई दिल्ली, 6 सितंबर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम प्रणाली एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। इस बार मुद्दा हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में अल्पसंख्यक समुदायों के लिए कोटे को लेकर है। एक नई जनहित याचिका (PIL) में इस कोटे को सीधे तौर पर संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ बताया गया है और इसे असंवैधानिक ठहराने की मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति में धर्म आधारित किसी भी सिफारिश पर अमल करने से रोका जाए। उनका तर्क है कि संविधान में धर्मनिरपेक्षता एक मूलभूत सिद्धांत है, और ऐसे में किसी व्यक्ति के धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर न्यायिक पदों के लिए नामों की सिफारिश करना संविधान का उल्लंघन है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण बन गया है क्योंकि इससे सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम प्रणाली की पारदर्शिता और तटस्थता पर सवाल उठ रहे हैं। कॉलेजियम, जो कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों का एक समूह होता है, वकीलों के नामों की सिफारिश करता है, जिनमें SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले उम्मीदवार भी शामिल होते हैं।
जनहित याचिका में दिसंबर 2024 में संसद में दिए गए केंद्रीय कानून मंत्री के एक बयान का भी हवाला दिया गया है। मंत्री ने लोकसभा में कहा था कि सरकार ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया है कि वे SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक और महिला उम्मीदवारों के नाम सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भेजें, ताकि न्यायपालिका में सामाजिक विविधता सुनिश्चित की जा सके।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार का सरकारी हस्तक्षेप न केवल कॉलेजियम प्रणाली की स्वायत्तता को कमजोर करता है, बल्कि यह संविधान के उस मूल विचार के भी खिलाफ है, जो धर्मनिरपेक्षता की गारंटी देता है।
अब सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह तय करेगा कि क्या न्यायपालिका में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने के नाम पर धर्म और जाति को आधार बनाना उचित है या नहीं। यह फैसला भविष्य में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया के लिए एक नज़ीर साबित हो सकता है।

