भारत के कितने सच्चे सहयोगी? पाकिस्तान-सऊदी रक्षा समझौते से बढ़ी चिंताएं

नई दिल्ली, 20 सितम्बर (अशोक “अश्क) दुनिया के मौजूदा हालात में भारत के लिए यह सवाल अहम बन गया है कि उसके भरोसेमंद दोस्त आखिर हैं कौन? जब ज़रूरत पड़ी, तो क्या कोई देश खुलकर भारत के साथ खड़ा हुआ? हाल के वर्षों में खासकर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह साफ दिखा कि भारत के पुराने दोस्त भी उसके साथ पूरी मजबूती से नहीं आए। रूस, जो दशकों से भारत का रणनीतिक साझेदार रहा है, उसने भी खुलकर समर्थन नहीं जताया। अमेरिका की स्थिति पहले से ही असमंजस भरी रही है। अन्य देशों ने भी गोलमोल बयान देकर कूटनीतिक दूरी बनाए रखी।


वहीं दूसरी ओर, पाकिस्तान को चीन, तुर्की और अजरबैजान जैसे देशों का खुला समर्थन मिला। अब इसमें सऊदी अरब का नाम भी जुड़ गया है। 17 सितंबर को पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते (Strategic Mutual Defense Agreement) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सऊदी यात्रा के दौरान हुआ, जिसमें सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भी मौजूद रहे।
इस रक्षा समझौते के तहत यदि दोनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो दूसरा देश उसे खुद पर हमला मानकर जवाब देगा। इस समझौते को दोनों देशों के बीच दशकों पुराने सुरक्षा संबंधों का विस्तार माना जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, यह किसी विशेष घटना की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वर्षों की बातचीत का परिणाम है। फिर भी यह समय काफी संवेदनशील है, क्योंकि खाड़ी देश इस वक्त इजरायल और ईरान के बीच संतुलन साधने में लगे हैं।
भारत के विदेश मंत्रालय ने भी इस पर गंभीरता से नजर बनाई हुई है। प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बयान में कहा कि सरकार इस समझौते के भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर रही है। साथ ही भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा को सर्वोपरि रखेगा।
डिफेंस एक्सपर्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जेएस सोढ़ी के मुताबिक, सऊदी अरब भले ही पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता कर रहा हो, लेकिन वह भारत से अपने संबंध बिगाड़ना नहीं चाहेगा। क्योंकि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और श्रमबल, दोनों में भारतीयों की अहम भूमिका है। हालांकि, समझौते की शर्तों के चलते संघर्ष की स्थिति में सऊदी को पाकिस्तान का साथ देना मजबूरी बन सकता है—चाहे वह सीधे सैन्य कार्रवाई ना करे, लेकिन हथियारों या तकनीकी सहायता के रूप में समर्थन संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब अपनी रक्षा तैयारियों को और तेज करने की जरूरत है। साथ ही, उसे बाकी देशों के साथ भी रक्षा सहयोग को मजबूती देनी चाहिए। सऊदी अरब की सैन्य ताकत भले ही आकार में छोटी हो, लेकिन तकनीक के लिहाज से वह बेहद सक्षम है—उसे अमेरिका, रूस और चीन से अत्याधुनिक हथियार मिलते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वैश्विक मंच पर उसके कितने सच्चे मित्र हैं, और भविष्य में वह किन देशों के साथ खड़ा हो सकता है। भारत को अब रणनीतिक साझेदारियों में नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

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