समस्तीपुर, 28 सितम्बर (अशोक “अश्क”) दुनिया भर में लोकतंत्र की मजबूती और स्वतंत्र अभिव्यक्ति की रक्षा की बातें अब गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं। भारत में नरेंद्र मोदी और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं के उदय ने लोकतंत्र के स्वरूप को लेकर वैश्विक बहस को जन्म दिया है।

2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने, तो विदेशों में भारत को लेकर यह आशंका जताई गई कि क्या देश ने एक ‘हिंदू फासीवादी’ को सत्ता सौंपी है। लेकिन उस समय भारतीयों ने यह चुनाव उम्मीदों और बदलाव की चाह में किया था। कांग्रेस के वर्षों के वंशवादी शासन से तंग जनता ने मोदी को एक सशक्त विकल्प माना।
हालांकि, समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि सत्ता केंद्रित राजनीति और आलोचना विहीन शासन लोकतंत्र को कमजोर करता है। इसी तरह अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के बेतुके भाषणों और संस्थाओं पर हमलों ने वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिला दिया।
संयुक्त राष्ट्र में ट्रंप का हालिया भाषण, जिसमें उन्होंने जलवायु संकट को “ढकोसला” और रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए भारत-चीन को जिम्मेदार ठहराया, उनकी गैर-जिम्मेदाराना राजनीति का उदाहरण है।
फिर भी, अमेरिका की लोकतांत्रिक चेतना उम्मीद जगाती है। मशहूर टीवी होस्ट जिमी किमेल के कार्यक्रम को दबाव में बंद करने की ट्रंप की कोशिश को जनता के विरोध के चलते पलटना पड़ा। सैनिक परेड जैसी ‘शहंशाही’ परंपरा थोपने पर अमेरिका भर में विरोध हुआ, जिसमें आम लोग “नो किंग्स” जैसे पोस्टरों के साथ सड़कों पर उतरे।
भारत में यह जन चेतना कमजोर दिखती है। यहां अब विरोध केवल राजनीतिक दलों की अगुआई में होता है, आम जनता खामोश रहती है। निजी टीवी चैनलों की चापलूसी लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत है।
लोकतंत्र सिर्फ चुनावों से नहीं, जनता की जागरूकता और विरोध की ताकत से जिंदा रहता है। अमेरिका में ट्रंप जैसे नेता के खिलाफ उठ रही आवाजें यह साबित करती हैं कि वहां अब भी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हैं। भारत में भी अगर जनता खामोशी तोड़े और सच का साथ दे, तभी लोकतंत्र की असली रक्षा हो सकेगी।

