नई दिल्ली, 28 सितंबर (अशोक “अश्क”) देश की अदालतों में बढ़ते लंबित मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। 22 सितंबर को एक अहम आदेश में कोर्ट ने कहा कि “तेज सुनवाई नागरिक के जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।” कोर्ट ने हाई कोर्ट्स को निर्देश दिए कि वे जिला न्यायालयों को सर्कुलर जारी करें, जिसमें कहा गया हो कि वकीलों की अनुपलब्धता के आधार पर सुनवाई स्थगित नहीं की जा सकती है। सिवाय शोक की स्थिति के।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर आरोपी और उनके वकील जानबूझकर सुनवाई टालने की कोशिश करते हैं, तो उनकी ज़मानत रद्द करने पर विचार होना चाहिए। कोर्ट का यह निर्देश देश की न्याय प्रणाली की मौजूदा स्थिति को देखते हुए आया है।
25 सितंबर 2025 तक देशभर में कुल 5.34 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें से 4.7 करोड़ मामले जिला और निचली अदालतों में हैं। हाई कोर्ट्स में 63.8 लाख और सुप्रीम कोर्ट में 88,251 मामले लंबित हैं।
नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, 1.78 करोड़ मामलों में देरी के कारण स्पष्ट हैं। इनमें से 81% आपराधिक और 19% सिविल मामले हैं। हालांकि लगभग 3 करोड़ मामलों में देरी का कोई स्पष्ट कारण नहीं दर्ज है, जो एक बड़ी प्रणालीगत समस्या को उजागर करता है।
देरी के प्रमुख कारणों में शामिल हैं:
- 62 लाख मामलों में वकीलों की अनुपलब्धता
- 35 लाख मामलों में आरोपी फरार
- 27 लाख मामलों में गवाह गायब
- 23 लाख मामलों पर कोर्ट द्वारा रोक
- 14 लाख मामलों में दस्तावेजों की प्रतीक्षा
- 8 लाख मामलों में पक्षकारों की उदासीनता
इसके अतिरिक्त, बार-बार अपील, आवश्यक रिकॉर्ड की अनुपलब्धता, अतिरिक्त गवाहों की मांग, और मृत पक्षकारों के कानूनी प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति भी देरी के बड़े कारण हैं।
जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस विश्वनाथन की बेंच ने टिप्पणी की,
“निचली अदालतें मामूली कारणों से सुनवाई स्थगित कर देती हैं, यहां तक कि जब गवाह मौजूद होते हैं तब भी।”
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों से आग्रह किया कि वे इन आदेशों का सख्ती से पालन करें ताकि लंबित मामलों की संख्या घटे और नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके।
यह निर्देश भारत की न्याय प्रणाली में पारदर्शिता, गति और जवाबदेही लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

