समस्तीपुर, 1 अक्तूबर (मोहम्मद जमशेद) दुनिया आज जलवायु संकट, आर्थिक असमानता और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य भी इसी बात पर जोर देते हैं कि विकास तभी सार्थक होगा जब वह पर्यावरण-संवेदनशील, सामाजिक रूप से न्यायसंगत और आर्थिक रूप से समावेशी हो।

गांधीजी ने कहा था, “पृथ्वी पर सभी की जरूरतें पूरी करने लायक संसाधन हैं, लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं।” उनका यह विचार आज के अंधाधुंध उपभोग और संसाधनों के दोहन को लेकर चेतावनी जैसा प्रतीत होता है।
गांधीजी का “ग्राम स्वराज” मॉडलविकेन्द्रीकरण, स्थानीय अर्थव्यवस्था और समुदाय आधारित विकास की आज की नीतियों से मेल खाता है। उनका ‘ट्रस्टीशिप’ सिद्धांत, अमीरों और उद्योगपतियों को समाज के प्रति जिम्मेदार बनाने की वकालत करता है, जो आज के कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी और ग्रीन बिज़नेस को दिशा देता है।
सामाजिक दृष्टि से, गांधीजी ने अस्पृश्यता, जातीय भेदभाव और लैंगिक असमानता के खिलाफ संघर्ष किया, जो आज SDG-5 (लैंगिक समानता) और SDG-10 (असमानता में कमी) जैसे लक्ष्यों की प्रेरणा बनते हैं।
पर्यावरण के क्षेत्र में, उन्होंने ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ और सीमित उपभोग का संदेश दिया, जो आज के समय में कार्बन फुटप्रिंट घटाने और अक्षय ऊर्जा को अपनाने जैसी पहलों में दिखता है।
भारत भी गांधीवादी सोच को अपनाते हुए वैश्विक नेतृत्व कर रहा है। “LiFE” यानी Lifestyle for Environment, सौर ऊर्जा मिशन, जल संरक्षण, जैविक खेती, और स्थानीय रोजगार सृजन ये सब गांधीजी के विचारों का ही आधुनिक रूप हैं।
डॉ. विजय कुमार गुप्ता, वरीय सहायक प्राध्यापक, अर्थशास्त्र विभाग, वीमेंस कॉलेज समस्तीपुर के अनुसार, “गांधीजी का दर्शन हमें सिखाता है कि सतत विकास सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि जीवन और विकास की एक नैतिक दिशा है।”
गांधीजी के विचारों के आलोक में, समस्तीपुर जैसे छोटे शहर भी एक न्यायपूर्ण, पर्यावरण-सम्मत और मानव केंद्रित विकास की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

