नई दिल्ली, 1 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने सरकारी संस्थानों की मुकदमेबाजी की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराज़गी जताई है। उन्होंने कहा कि ऐसे मुकदमे, जिनकी सफलता की संभावना न के बराबर होती है, उन पर समय और संसाधन खर्च करना देश के हित में नहीं है। भुवनेश्वर में आयोजित एक राष्ट्रीय सम्मेलन में बोलते हुए उन्होंने कहा, “अगर सरकारी संस्थान यूं ही एक के बाद एक मुकदमे दायर करते रहेंगे, तो इससे देश के संसाधनों की बर्बादी होगी और न्यायालय का कीमती समय भी व्यर्थ जाएगा।”

जस्टिस नागरत्ना ने वकीलों से अपील की कि वे खुद को केवल कानूनी लड़ाई लड़ने वाला पेशेवर नहीं, बल्कि “मानव संघर्ष के उपचारक” के रूप में देखें। उन्होंने संसद द्वारा पारित मेडिएशन एक्ट, 2023nको न्याय व्यवस्था में एक क्रांतिकारी पहल बताया और इसे अदालतों का बोझ कम करने तथा आम लोगों को न्याय सुलभ कराने की दिशा में एक बड़ा कदम कहा।
उन्होंने मध्यस्थता (मेडिएशन) को लेकर समाज में फैली इस भ्रांति को खारिज किया कि यह न्याय का कमजोर विकल्प है। उनके अनुसार, “मेडिएशन एक समयबद्ध, सुलभ और न्यायसंगत प्रक्रिया है, जो पारंपरिक मुकदमेबाजी से कहीं अधिक प्रभावी हो सकती है।”
जस्टिस नागरत्ना ने कुछ व्यावहारिक सुझाव भी दिए जैसे:
पर्यावरण मामलों में ग्रीन मीडिएटर की तैनाती
स्वास्थ्य विवादों में पेशेंट एडवोकेसी ग्रुप्स की भूमिका
बौद्धिक संपदा मामलों में WIPO जैसी प्रणाली
स्टार्टअप अनुबंधों में अनिवार्य मेडिएशन क्लॉज
किशोर न्याय से जुड़े मामलों में ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड मीडिएटर के जरिए पीड़ित-अपराधी संवाद
पूर्व एडवोकेट जनरल बीरेन्द्र सराफ ने कॉमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 12-ए के तहत प्री-लिटिगेशन मेडिएशन की विफलता पर चिंता जताई और इसे ठीक करने की मांग की। वहीं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह ने “मेडिएशन डिवाइड” पर प्रकाश डाला और मेट्रो शहरों बनाम ग्रामीण क्षेत्रों के बीच पहुंच की असमानता को कम करने की बात कही।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया ने पर्यावरण और विकास से जुड़े मामलों जैसे भूस्खलन, विस्थापन और प्रदूषण को लेकर राज्य, कॉर्पोरेट और आम जनता के बीच संवाद आधारित समाधान की आवश्यकता जताई।
जस्टिस जयनाथ बनर्जी ने कहा कि किसी भी समझौते की वैधता उसकी स्पष्टता और लागू करने की क्षमता पर निर्भर करती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अधकचरे या अपुर्ण प्रशिक्षित मीडिएटर जनता का भरोसा तोड़ सकते हैं, जिससे पूरे तंत्र की साख पर असर पड़ेगा।
इस सम्मेलन ने स्पष्ट संकेत दिया कि भारत की न्याय व्यवस्था में मेडिएशन एक अहम भूमिका निभा सकता है, बशर्ते इसे प्रभावी रूप से लागू किया जाए और समाज में इसकी स्वीकार्यता बढ़े। न्यायिक विशेषज्ञों की राय इस दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।

