पूर्णिया, 05 अक्टूबर (राजेश कुमार झा) बीते दिनों ट्रेन की चपेट में आने से चार नाबालिक बच्चों की दर्दनाक मौत ने पूरे सिस्टम को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया. इन चार नाबालिक बच्चों की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए. सबसे बड़ा सवाल आखिर किसने इन्हें मखाना फोड़ी में काम करने की इजाजत दी. इनके अभिभाक ने इन्हें क्यों नहीं रोका. 30 किलोमीटर दूर ये कसबा के पास किसके कहने पर और क्यों गए थे.

बताते चलें कि बीते दिनों जोगबनी से दानापुर जाने वाली वंदे भारत ट्रेन अपनी रफ्तार से अपने गंतव्य की ओर जा रही थी. इसी दरमियान इनकी चपेट में 5 नाबालिक बच्चे आ गए. जिनमें तीन नाबालिक की मौत घटना स्थल पर हो गई. एक नाबालिक बच्चे की मौत राजकीय मेडिकल कॉलेज में इलाज के दौरान हो गई.एक नाबालिक बच्चे अभी अपनी जिंदगी और मौत से जूझ रहे है. सवाल आखिर इन नाबालिक बच्चों की मौत का जिम्मेवार कौन? फिलहाल ये अनुसंधान का विषय है.बताते चलें कि जिले में कुल 127 छोटे बड़े मखाना फोड़ी का काम चलता है. कहीं 300 मजदूर तो कहीं 500 मजदूर और कहीं 30 मजदूर भी काम करते है.लेकिन सबसे बड़ी बात इन मखाना फोड़ी में तकरीबन 70 प्रतिशत बच्चे नाबालिक है, जो यहां बाल मजदूरी करते है और प्रतिदिन 600 से 1000 रूपये कमाते है. जिनकी वजह से इनके अभिभावक भी इन्हें काम करने के लिए मना नहीं करते है. गौरतलब है कि इन मखाना फोड़ी में इन बच्चों को नशे की भी लत लगाई जाती है.ताकि इन बच्चों से ज्यादा से ज्यादा काम ले सकें. बताते चलें कि जिले के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक निशांत तिवारी ने मखाना फोड़ी में काम करने वाले बच्चों के पठन पाठन के लिए पाठशाला का इंतजाम किए थे.ताकि इन बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ा जा सके.लेकिन कुछ समय तक तो ये सब ठीक ठाक चला.लेकिन बाद में इन बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से हटाकर फिर ये अपने पुराने धंधे में लगा दिया गया.अगर इस दर्दनाक मौतों की निष्पक्ष जांच हो तो कई बड़े सफेदपोश जेल की सलाखों के पीछे होंगे.

