नई दिल्ली, 10 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के दशहरे पर दिए गए तीखे बयान ने एक बार फिर पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) को लेकर राजनीतिक और सामरिक हलकों में हलचल तेज कर दी है। उन्होंने सर क्रीक को लेकर पाकिस्तान को चेतावनी दी कि किसी दुस्साहस का ऐसा जवाब मिलेगा, जिससे इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएंगे। इसके अगले ही दिन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने ऑपरेशन 2.0 की चेतावनी देते हुए कहा कि अब संयम नहीं बरता जाएगा, अगली बार पाकिस्तान का भूगोल बदल देंगे।

इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह की जम्मू-कश्मीर सुरक्षा को लेकर उच्च स्तरीय बैठक और विदेश मंत्री द्वारा पीओजेके को भारत का हिस्सा बताए जाने पर सोशल मीडिया पर अटकलें तेज हैं कि क्या सरकार किसी बड़ी कार्रवाई की तैयारी में है?
डिफेंस एक्सपर्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी बताते हैं कि पीओके सिर्फ भू-भाग नहीं, एक रणनीतिक मोर्चा है जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और चीन की सीमाओं को जोड़ता है। यहां से चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) भी गुजरता है, जिसमें चीन ने भारी निवेश किया है।
सोढ़ी कहते हैं कि पहाड़ों में लड़ाई का अनुपात मैदान से तीन गुना अधिक होता है। 1999 की कारगिल लड़ाई में भी यही देखा गया था। पहाड़ों में 100 दुश्मनों से लड़ने के लिए 900 सैनिकों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में पीओके हासिल करना सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि सैन्य और रणनीतिक रूप से भी बड़ी चुनौती है।
पूर्व सेनाध्यक्षों के अनुसार, पीओके पर कोई भी अभियान सिर्फ पाकिस्तान से युद्ध नहीं होगा, बल्कि इसमें चीन की भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी हो सकती है। चीन पहले ही शक्सगाम घाटी और अक्साई चिन जैसे क्षेत्रों में मौजूद है और पीओके में कई परियोजनाओं में निवेश कर चुका है।
सरकारी बयानों से भले ही आक्रामक रणनीति का संकेत मिल रहा हो, लेकिन पीओके को पुनः भारत में मिलाने का रास्ता आसान नहीं है। यह न केवल सैन्य चुनौती है, बल्कि कूटनीतिक और वैश्विक समीकरणों से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा भी है।

