नई दिल्ली, 12 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) शनिवार को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई ने संवैधानिक सुरक्षा और समावेशन के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि कैसे संविधान हाशिए पर पड़े लोगों को अछूत से समान दर्जा दिलाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाता है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, गवई ने कहा कि छोटी जाति के परिवार में जन्म लेने के बावजूद संविधान ने उन्हें न केवल सुरक्षा बल्कि सम्मान, अवसर और मान्यता भी दी है, जिससे समावेशिता एक सजीव वास्तविकता बन गई है।

हनोई में LAWASIA सम्मेलन में दिए अपने भाषण में सीजेआई ने बताया कि विविधता और समावेशन कोई अमूर्त विचार नहीं, बल्कि लाखों लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें हैं। उन्होंने कहा कि ये समानता और सामाजिक न्याय का प्रतीक हैं, जो समाज को समतामूलक बनाने का लक्ष्य रखते हैं। गवई ने अपने जीवन पर महात्मा गांधी, बी.आर. अंबेडकर, गौतम बुद्ध और अपने पिता के प्रभावों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने कानून को समानता का माध्यम बनाने के लिए कार्य किया।
सीजेआई ने एक ऐसे मामले का उदाहरण भी दिया, जहां उन्होंने एक समुदाय का प्रतिनिधित्व किया जिसने पहले कभी डॉक्टर नहीं बनाया था, और इसे आशा का प्रतीक बताया। उन्होंने वकीलों से कहा कि प्रत्येक मामला संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का अवसर है।
न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों को सामाजिक न्याय और समावेशन के मूल्य बढ़ाने वाली व्याख्याएं अपनानी चाहिए, क्योंकि कठोर कानून की व्याख्याएं असमानता को बढ़ावा दे सकती हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि न्यायपालिका हाशिए पर पड़े समुदायों के ऐतिहासिक भेदभाव को नजरअंदाज नहीं कर सकती।

