नई दिल्ली, 16 अक्टूबर (अशोक “अश्क”) देशभर के सरकारी स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) को अनिवार्य करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अब बड़ी पीठ सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने इस मुद्दे में उठे कानूनी पहलुओं को गंभीर बताते हुए इसे चीफ जस्टिस के पास भेजने का फैसला लिया है, ताकि एक बड़ी संविधान पीठ बनाकर सभी पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई हो सके।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने 1 सितंबर 2025 को दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि 2011 के बाद नियुक्त सभी शिक्षकों के लिए TET पास करना अनिवार्य होगा। जो शिक्षक अब तक यह परीक्षा पास नहीं कर सके हैं, उन्हें दो साल के भीतर TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य होगा, अन्यथा उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति लेनी पड़ेगी।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि जिन शिक्षकों की सेवा पांच साल से कम शेष है, उन्हें TET से छूट दी जाएगी, लेकिन यदि वे प्रमोशन चाहते हैं तो परीक्षा पास करना जरूरी होगा।
यह मामला तब और महत्वपूर्ण हो गया जब उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों में टीईटी की अनिवार्यता को लेकर शिक्षकों ने याचिकाएं दायर कीं। अब बड़ी पीठ द्वारा होने वाली सुनवाई से तय होगा कि शिक्षकों के अधिकारों, योग्यता और सेवा शर्तों को लेकर आगे की दिशा क्या होगी।
फैसले का असर देशभर के लाखों शिक्षकों और आगामी नियुक्तियों पर पड़ेगा। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को ‘संवैधानिक और न्यायिक विवेक का उदाहरण’ बताया है।

