नई दिल्ली, 20अक्तूबर (अशोक “अश्क”) अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच 2640 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा रेखा, डूरंड रेखा एक बार फिर दोनों देशों के बीच टकराव का कारण बन गई है। यह रेखा 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच हुए समझौते के तहत स्थापित की गई थी, जिसका नाम ब्रिटिश राजनयिक सर मोर्टिमर डूरंड के नाम पर पड़ा। यह पख्तून जनजातियों के पारंपरिक इलाकों को विभाजित करती है, जो दोनों देशों में बड़ी संख्या में रहते हैं।

अफगानिस्तान इस रेखा को औपचारिक अंतरराष्ट्रीय सीमा मानने से इनकार करता है। काबुल का तर्क है कि यह समझौता ब्रिटिश दबाव में अमीर अब्दुर रहमान खान से करवाया गया था, जो पख्तून सांस्कृतिक और जातीय एकता को तोड़ता है। अफगान सरकार का यह भी दावा है कि यह समझौता केवल 100 वर्षों के लिए था, जिसकी वैधता 1993 में समाप्त हो चुकी है। वहीं पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है और इसे अपनी संप्रभुता का हिस्सा बताता है।
डूरंड रेखा न केवल एक राजनीतिक मुद्दा है, बल्कि यह सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़ा है। सीमा पर तस्करी, आतंकवाद और अवैध आवाजाही को रोकने के लिए पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में बाड़ लगाने और सैन्य चौकियां बनाने का प्रयास किया है, जिसका अफगानिस्तान ने कड़ा विरोध किया है। यह टकराव अब हिंसक रूप ले चुका है।
अफगान सूत्रों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में पाकिस्तान ने 1200 से अधिक बार अफगान सीमा और 710 बार अफगान हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है। हाल ही में काबुल पर पाकिस्तान के हवाई हमले के बाद तनाव चरम पर पहुंच गया। इसके जवाब में अफगानिस्तान ने 11 अक्टूबर को डूरंड रेखा पर पाकिस्तानी सेना की चौकियों के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया।
अफगानिस्तान ने दावा किया कि उसने यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत आत्मरक्षा के अधिकार के तहत की है। यह घटनाक्रम न केवल दोनों देशों के संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना रहा है, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। डूरंड रेखा को लेकर यह पुराना विवाद अब एक बार फिर नए संघर्ष की चिंगारी बनता दिख रहा है।

