नई दिल्ली, 23 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार विवाद में चीन की भूमिका अहम होती जा रही है, क्योंकि बांग्लादेश में “तीस्ता मास्टर प्लान” को लेकर चीन समर्थित रुख तेज हो गया है। हाल ही में चटगांव विश्वविद्यालय में सैकड़ों छात्रों ने इस योजना के तत्काल कार्यान्वयन की मांग करते हुए प्रदर्शन किया। ढाका में इसे भारत के साथ लंबे समय से लंबित जल समझौते के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

भारत के लिए यह मामला रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील है, क्योंकि तीस्ता नदी पश्चिम बंगाल और सिक्किम से होकर बहती हुई बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र (जमुना) में मिल जाती है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि तीस्ता मास्टर प्लान का क्षेत्र सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे “चिकेन नेक” कहा जाता है, के बेहद करीब है। यह संकरी पट्टी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती है, जिससे इसकी सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत और बांग्लादेश के बीच वर्तमान में 1996 का गंगा जल बंटवारा समझौता लागू है, जो वर्ष 2026 में समाप्त हो जाएगा। इस पृष्ठभूमि में बांग्लादेश का चीन के साथ अलग परियोजना पर आगे बढ़ना भारत की जल सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के लिए चुनौती बन सकता है।
ढाका का आरोप है कि भारत सूखे मौसम में पानी रोकता है जबकि मानसून में अत्यधिक पानी छोड़ देता है, जिससे बाढ़ की स्थिति बनती है। इसी वर्ष मार्च में प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने चीन से तीस्ता नदी प्रबंधन के लिए 50 वर्षीय योजना तैयार करने का अनुरोध किया था। बांग्लादेश ने पहले चरण के लिए 6,700 करोड़ टका की सहायता मांगी है और कई राजनीतिक दल, जिनमें बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी भी शामिल है, इसका समर्थन कर रहे हैं।
भारत को चिंता है कि चीन की भागीदारी से न केवल जल विवाद गहराएगा बल्कि क्षेत्र में उसकी सैन्य निगरानी भी बढ़ सकती है। खासकर लालमोनिरहाट एयरबेस के पास संभावित चीनी उपस्थिति भारत के लिए सुरक्षा चुनौती बन सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में चीनी कर्मियों की मौजूदगी भारत के सैन्य ढांचे और गतिविधियों की निगरानी का अवसर दे सकती है। इसलिए तीस्ता नदी अब केवल जल विवाद नहीं, बल्कि भारत-चीन-बांग्लादेश के बीच उभरते भू-राजनीतिक समीकरणों का केंद्र बन गई है।

