नई दिल्ली, 24 अक्टूबर (अशोक “अश्क”) दिवाली के बाद अब बिहार और पूर्वी भारत में छठ महापर्व की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। घाटों की सफाई से लेकर प्रसाद की थालियों तक हर जगह एक ही आवाज गूंजने लगी है, दिवंगत लोकगायिका शारदा सिन्हा की। जिन्हें प्यार से ‘बिहार कोकिला’ कहा जाता था। उनकी मधुर और भक्ति से भरी आवाज के बिना छठ पूजा की कल्पना ही अधूरी लगती है।

पिछले वर्ष शारदा सिन्हा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी गायकी अब भी हर आस्थावान दिल में जिंदा है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड तक उनके गीत छठ पर्व की आत्मा बन चुके हैं। हर साल सूर्य उपासना के इस पर्व पर उनके गीत घाटों और घरों में एक अद्भुत आध्यात्मिक माहौल बना देते हैं।
शारदा सिन्हा के कई गाने आज भी छठ पूजा की शान माने जाते हैं। इनमें ‘हो दीनानाथ’, ‘पहिले पहिल छठी मैया’, ‘कांच ही बांस के बहंगिया’, ‘पटना के घाट पर’ और ‘उठू हे सूर्य देव’ जैसे गीत खास तौर पर लोकप्रिय हैं।
उनका गाना ‘पहिले पहिल छठी मैया’ आज भी हर छठ पर्व पर सबसे ज्यादा सुना और ट्रेंड करता है। आठ साल पहले रिलीज हुए इस गीत में मां के प्रति आस्था और प्रायश्चित्त का भाव झलकता है। इसे खुद शारदा सिन्हा ने कंपोज किया था और गीत के बोलों में भी उनका विशेष योगदान रहा।
शारदा सिन्हा के गीतों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उनमें लोकसंगीत की गहराई और भक्ति की सादगी एक साथ मिलती थी। उनकी आवाज सुनते ही छठव्रती महिलाओं और श्रद्धालुओं में भक्ति का भाव जाग उठता है।
भले ही ‘बिहार कोकिला’ अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन छठ पूजा के हर सूर्योदय और अर्घ्य में उनकी आवाज आज भी गूंजती है मानो वो कह रही हों, “ऊग हे सूरज देव, अर्घ्य स्वीकार करी…”

