नई दिल्ली, 28 अक्तूबर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने एक कानून के छात्र द्वारा दायर उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है, जिसमें उसने अपने खिलाफ फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। इस पोस्ट में लिखा गया था—“बाबरी मस्जिद भी एक दिन फिर से बनाई जाएगी, जैसे तुर्की में सोफिया मस्जिद को दोबारा बनाया गया।”

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची की पीठ ने कहा कि उन्होंने फेसबुक पोस्ट देख ली है और उन्हें इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता। अदालत ने टिप्पणी की कि अभियुक्त द्वारा उठाए गए सभी बचाव के बिंदु ट्रायल कोर्ट में अपने गुण-दोष के आधार पर विचार किए जा सकते हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली।
यह मामला 2020 में दर्ज एफआईआर से संबंधित है। एफआईआर के अनुसार, यह पोस्ट 5 अगस्त 2020 को की गई थी—वही दिन जब अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन का कार्यक्रम हुआ था। पुलिस ने इसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील बताते हुए छात्र के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि उसकी पोस्ट संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिसमें कोई भड़काऊ या अपमानजनक शब्द नहीं थे। उसने कहा कि कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां तीसरे पक्ष के अकाउंट्स से आई थीं, जिन्हें गलत तरीके से उसके नाम से जोड़ा गया। जांच में यह भी सामने आया कि इनमें से एक अकाउंट फर्जी प्रोफाइल था, फिर भी कार्रवाई केवल उसी के खिलाफ जारी रखी गई।
याचिका में यह भी कहा गया कि इसी पोस्ट के आधार पर उसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत एक वर्ष से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था, जिसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2021 में रद्द कर दिया था।
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अदालत ने पोस्ट नहीं देखी, तो न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सख्ती से जवाब देते हुए कहा—“ऐसा मत कहिए कि हमने नहीं देखी। यदि आप ऐसा व्यवहार करेंगे, तो इसके परिणाम भुगतने होंगे।”
अंततः याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

