नई दिल्ली, 30 अक्टूबर (अशोक “अश्क”) 50 रुपये की मामूली रिश्वत के आरोप में दोषी ठहराए गए मध्य रेलवे के टीटीई को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया। हालांकि, इस लंबित विवाद का निष्पादन 37 साल बाद हुआ और इस बीच टीटीई दुनिया को अलविदा कह गए। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि आरोप साबित नहीं हो सके हैं। अदालत ने टीटीई के कानूनी उत्तराधिकारियों को तीन महीने के भीतर आर्थिक और पेंशन संबंधी लाभ देने का आदेश भी दिया।

मामला 31 मई 1988 का है, जब रेलवे विजिलेंस टीम ने अचानक जांच की थी। आरोप था कि टीटीई ने बर्थ देने के बदले तीन यात्रियों से 50 रुपये की रिश्वत ली। जांच में उनके पास 1254 रुपये अतिरिक्त पाए गए थे और ड्यूटी कार्ड पास में जालसाजी के आरोप भी लगे। विभागीय जांच में आरोप साबित होने पर 1996 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
साल 2002 में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) ने बर्खास्तगी को रद्द कर बहाली का आदेश दिया। लेकिन 2017 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने CAT के इस फैसले को पलट दिया। अब 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय का आदेश रद्द करते हुए CAT के आदेश को सही ठहराया। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ सभी आरोप साबित नहीं हुए। जांच में पाया गया कि एक यात्री की पुष्टि नहीं हुई और दो अन्य ने आरोपों का समर्थन नहीं किया।
बेंच ने स्पष्ट किया कि जुर्माने का आदेश रद्द करना और CAT का बहाली आदेश पूरी तरह सही था। इस फैसले के साथ टीटीई की सेवा बहाल करने और उत्तराधिकारियों को लाभ प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

