नई दिल्ली, 02 नवम्बर (अशोक “अश्क”) भारतीय वायुसेना इस समय लड़ाकू विमानों की भारी कमी से जूझ रही है। जरूरत 42 स्क्वाड्रन की है, जबकि मौजूदा संख्या सिर्फ 31 है। हालात को सुधारने के लिए वायुसेना ने हाल ही में सरकार को 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन सरकार ने इसे संशोधन के लिए वापस भेज दिया है। बताया जा रहा है कि यह सौदा दो लाख करोड़ रुपये से अधिक का है और केंद्र सरकार चाहती है कि राफेल निर्माता कंपनी भारत में अधिक से अधिक पार्ट्स का उत्पादन करे और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी सुनिश्चित हो।

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, राफेल डील को अंतिम रूप देने में देरी भारत की रणनीतिक तैयारियों पर असर डाल सकती है। अगर आने वाले कुछ महीनों में यह डील आगे नहीं बढ़ती, तो इसकी अहमियत कम हो जाएगी, क्योंकि तब तक स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस MK-2 और पांचवीं पीढ़ी का फाइटर AMCA प्रोजेक्ट गति पकड़ लेंगे। तेजस MK-2 की पहली उड़ान 2027 में और सीरियल प्रोडक्शन 2029-30 में शुरू होने की योजना है। इसमें एडवांस एवियोनिक्स और AESA रडार सिस्टम लगाए जाएंगे, जिससे यह 4.5 पीढ़ी का फाइटर जेट बनेगा।
भारत पहले ही तेजस MK-1 का उत्पादन शुरू कर चुका है, जिसकी पहली खेप जल्द वायुसेना को सौंपी जाएगी। वहीं, AMCA प्रोटोटाइप 2030 तक पूरा कर 2035 तक वायुसेना को सौंपने की योजना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि फ्रांस से राफेल डील अब बहुत महंगी और लंबी प्रक्रिया बनती जा रही है। अगर जल्द फैसला नहीं हुआ तो देसी जेट प्रोग्राम ही देश की वायु रक्षा का मुख्य स्तंभ बन सकता है। सरकार और HAL मिलकर निजी कंपनियों की मदद से तेजस उत्पादन बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।

