पटना, 11 नवम्बर (पटना डेस्क) बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दूसरे और आखिरी चरण में आज 20 जिलों की 122 सीटों पर मतदान हो रहा है। इनमें से 82 सीटें ऐसी हैं, जो सत्ता का समीकरण तय करेंगी। पहले चरण की 121 सीटों पर एनडीए और महागठबंधन के बीच बराबरी की टक्कर रही थी, लेकिन दूसरे फेज की ये सीटें निर्णायक मानी जा रही हैं।

पिछले तीन चुनावों—2010, 2015 और 2020 के नतीजे बताते हैं कि यह इलाका एनडीए का मजबूत किला रहा है। 2020 में एनडीए ने 122 में से 66 यानी 54% सीटें जीती थीं, जबकि महागठबंधन को 56 सीटों पर सफलता मिली थी। 2015 में जब जदयू महागठबंधन में थी, तब उसने 67 सीटें जीतीं, जबकि महागठबंधन को 54 सीटें मिलीं। 2010 में एनडीए को 104 सीटें यानी 85% सफलता मिली थी, जबकि महागठबंधन सिर्फ 11 सीटों तक सिमट गया था।
इन 82 निर्णायक सीटों में चंपारण का असर सबसे बड़ा माना जा रहा है। पूर्वी और पश्चिमी चंपारण की 21 विधानसभा सीटें एनडीए का पारंपरिक गढ़ मानी जाती हैं। 2020 में यहां एनडीए ने 17 सीटें (81%) जीती थीं, जबकि महागठबंधन को मात्र 4 सीटों से संतोष करना पड़ा। 2010 में तो एनडीए ने यहां 18 सीटों पर कब्जा किया था।
चंपारण में वैश्य, कोइरी, ईबीसी, मल्लाह/सहनी और थारू जनजाति की भूमिका निर्णायक रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यहां जातीय गोलबंदी से ज्यादा ‘जंगलराज विरोधी गोलबंदी’ प्रभावी होती है, यही कारण है कि हर बार एनडीए को 80% से अधिक सीटें मिलती रही हैं।
महागठबंधन इस बार सहनी समाज के नेता मुकेश सहनी की पार्टी को साथ लेकर इस समीकरण को तोड़ने की कोशिश में है। वहीं प्रियंका गांधी ने बेतिया इलाके में थारू जनजाति के बीच सक्रिय अभियान चलाकर जातीय और जनजातीय समीकरण साधने की रणनीति अपनाई है।
अब देखना यह होगा कि क्या एनडीए अपने पारंपरिक किले को बचा पाएगा या महागठबंधन इस बार इतिहास बदल देगा।

