नई दिल्ली, 19 नवम्बर ( अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए अनुच्छेद 143 के संदर्भ पर महत्वपूर्ण राय जारी करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायपालिका राष्ट्रपति और राज्यपालों को राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए कोई बाध्यकारी समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने दस दिनों तक चली सुनवाई के बाद 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखा था। पीठ ने कहा कि यह प्रश्न संवैधानिक पदाधिकारियों के विवेक, संघीय संतुलन और संस्थागत गरिमा से जुड़ा है, इसलिए अदालत द्वारा समय-सीमा तय करना उचित नहीं होगा।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे विधायी प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब न करें, क्योंकि अत्यधिक देरी लोकतांत्रिक शासन के मूल सिद्धांतों को प्रभावित करती है। पीठ ने कहा कि अनुमोदन, वापसी या पुनर्विचार के लिए भेजने जैसे विकल्प संविधान में स्पष्ट रूप से वर्णित हैं, पर इनके प्रयोग की अवधि न्यायिक रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। अदालत ने इसे ‘संवैधानिक भरोसे और ज़िम्मेदारी’ से जुड़ा विषय बताया।
तमिलनाडु मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने याद दिलाया कि 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा लंबित रखे गए बिलों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि राष्ट्रपति को राज्यपाल के माध्यम से भेजे गए विधेयकों पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए। उस समय दिए गए निर्देश को ऐतिहासिक माना गया था, पर गुरुवार के निर्णय में स्पष्ट किया गया कि वह टिप्पणी बाध्यकारी समय-सीमा नहीं बल्कि मार्गदर्शक सिद्धांत थी, जिसका लक्ष्य विधायी प्रक्रिया में पारदर्शिता और गति सुनिश्चित करना था।

