पटना, 24 नवम्बर (पटना डेस्क) बिहार कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही है। पिछले हफ्ते पार्टी ने विधानसभा चुनाव के दौरान कथित रूप से पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल 43 नेताओं को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। हालांकि, नोटिस झेल रहे सभी नेताओं का कहना है कि उन्होंने किसी भी स्तर पर पार्टी के खिलाफ काम नहीं किया। इसके उलट इन नेताओं ने अब राज्य नेतृत्व पर ही मनमाने ढंग से कार्रवाई करने और पार्टी प्रक्रियाओं की अनदेखी के गंभीर आरोप जड़ दिए हैं।

नोटिस भेजे जाने के बाद इन नेताओं ने आपस में रणनीतिक चर्चा की। बागी माने जा रहे नेताओं ने आरोप लगाया कि बिहार में पार्टी का कामकाज देखने वाले जिम्मेदार नेता ने न तो कोई डिसिप्लिनरी जांच करवाई और न ही राष्ट्रीय नेतृत्व से अनुमति ली। उनका कहना है कि नियमों के मुताबिक ऐसे मामलों में केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में प्रक्रिया को ताक पर रख दिया गया।
बागियों ने बिहार कांग्रेस अध्यक्ष राजेश कुमार पर भी चुनाव के दौरान एकतरफा फैसले लेकर संगठन को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया है। नेताओं का कहना है कि जिले और ब्लॉक स्तर पर कार्यकर्ताओं की शिकायतों पर कतई ध्यान नहीं दिया गया, जिससे जमीनी स्तर पर संगठनात्मक ढांचा कमजोर हुआ और इसका सीधा असर विधानसभा चुनावों में दिखाई दिया। उन्होंने यहां तक दावा किया कि कुछ राज्य नेता आरएसएस और भाजपा के प्रभाव में काम कर रहे हैं।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कई नेताओं ने चेतावनी दी कि उनके खिलाफ किसी भी कठोर कार्रवाई से चुनावी हार के बाद पहले से कमजोर हो चुकी पार्टी को और नुकसान पहुंचेगा। वहीं एक वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि सेंट्रल लीडरशिप को डिसिप्लिनरी कमिटी की सिफारिशें भेजी जाएंगी और पार्टी नियमों के तहत अगला कदम उठाया जाएगा।
उधर कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने स्पष्ट किया कि बागी नेताओं से संबंधित पूरे मामले को डिसिप्लिनरी कमिटी देख रही है और रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई होगी। हालांकि, नोटिस थमाए जाने के बावजूद बागियों के तेवर नरम नहीं पड़े हैं। उन्होंने साफ कहा कि यदि उनकी आवाज दबाने की कोशिश की गई तो अगली बैठक में वे कड़ी प्रतिक्रिया और आगे की रणनीति पर विचार करेंगे। उनका कहना है—“हमने सिर्फ संगठन के हित में मुद्दे उठाए हैं।”

