नई दिल्ली, 09 दिसम्बर (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने पद संभालने के बाद पहली बार जाति से जुड़े एक बेहद अहम और रेयर फैसले ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने एक नाबालिग लड़की की शिक्षा प्रभावित न हो, इसके लिए उसकी मां की ‘आदि द्रविड़’ जाति के आधार पर अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र जारी करने की मंजूरी दे दी, भले ही लड़की के पिता गैर-एससी समुदाय से हों।

CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से इनकार कर दिया, जिसमें पुडुचेरी की बच्ची को शिक्षा प्रभावित होने की आशंका के मद्देनज़र एससी प्रमाणपत्र देने का निर्देश दिया गया था।पीठ ने स्पष्ट संकेत दिया कि बदलते समय में यह सवाल गंभीर है कि आखिर जाति प्रमाणपत्र केवल पिता की जाति के आधार पर ही क्यों जारी हो। अदालत ने कहा कि किसी एससी महिला के उच्च जाति से विवाह के बाद जन्मे बच्चों को भी मां की जाति के आधार पर अधिकार मिलना चाहिए, यदि उनका पालन-पोषण उसी समुदाय की परिस्थितियों में हुआ हो।इससे पहले 2003 के पुनीत राय बनाम दिनेश चौधरी केस में सुप्रीम कोर्ट पिता की जाति को निर्णायक कारक मान चुका था। हालांकि, 2012 के रमेशभाई दाभाई नायका बनाम गुजरात मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे की जाति निर्धारण सिर्फ पिता की जाति देखकर नहीं किया जा सकता, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि बच्चे का सामाजिक परिवेश क्या रहा।हाल के वर्षों में अदालत ने ऐसे कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। दिसंबर 2024 में न्यायालय ने गैर-दलित महिला और दलित पुरुष के विवाह को रद्द करते हुए उनके बच्चों को SC दर्जा बहाल रखा, जबकि नवंबर 2024 में एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि धर्मांतरण से जातिगत पहचान समाप्त हो जाती है और पुनः धर्मांतरण का दावा तभी मान्य होगा, जब इसे ठोस साक्ष्यों से सिद्ध किया जाए।CJI सूर्यकांत का यह ताज़ा फैसला अब जाति निर्धारण की पुरानी व्यवस्था पर नया सवाल खड़ा कर रहा है।

