नई दिल्ली, 01 दिसम्बर (अशोक “अश्क”) उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा मोटर व्हीकल एक्ट के तहत दर्ज 12 लाख से अधिक ट्रैफिक मामलों को एक झटके में खत्म करने के फैसले ने सुप्रीम कोर्ट को सख्त नाराज़ कर दिया है। सर्वोच्च अदालत ने इसे न सिर्फ अवैध बताया, बल्कि जनता की सुरक्षा के लिए “गंभीर खतरा’’ करार दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने दो टूक कहा कि ड्रंक ड्राइविंग जैसे नॉन-कंपाउंडेबल अपराध को महज इसलिए खत्म नहीं किया जा सकता कि मामले पांच साल से ज्यादा समय से पेंडिंग थे।

बेंच ने कड़े शब्दों में पूछा “शराब पीकर गाड़ी चलाने जैसे जानलेवा अपराध को बिना ट्रायल, बिना सजा खत्म कैसे कर दिया? क्या पब्लिक इंटरेस्ट की कोई कीमत नहीं?” अदालत ने चेतावनी दी कि ऐसे कदम ट्रैफिक कानूनों की डिटरेंस वैल्यू को खत्म कर देंगे और सड़क पर अराजकता बढ़ेगी।
UP सरकार ने 2017 से 2021 तक के सभी MV एक्ट मामलों को Uttar Pradesh Criminal Law (Composition of Offences and Abatement of Trials) Amendment Act 2023 के तहत बंद कर दिया था। इस सूची में ड्रंक ड्राइविंग (धारा 185), ओवरस्पीडिंग, खतरनाक ड्राइविंग, बिना लाइसेंस वाहन चलाना जैसे नॉन-कंपाउंडेबल अपराध भी शामिल थे।
याचिकाकर्ता और सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने बताया कि UP सरकार इससे पहले भी 1977 से 2021 के बीच पांच बार ट्रैफिक मामलों की सामूहिक माफी दे चुकी है। इससे MV एक्ट 1988 की रोकथाम और सजा की मूल भावना खत्म होती जा रही है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि राज्य सरकार केंद्र के नॉन-कंपाउंडेबल अपराधों को खत्म करने का अधिकार कैसे रखती है? बेंच ने इस कानून को “संवैधानिक रूप से संदिग्ध, मनमाना और सार्वजनिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ’’ बताया।
सड़क परिवहन मंत्रालय के अनुसार, UP में 2019–2023 के बीच 1,97,041 सड़क हादसे, 1,16,056 मौतें और 1,33,491 घायल हुए। कोर्ट ने कहा कि ऐसे राज्य में ट्रैफिक अपराधों की माफी “पब्लिक सेफ्टी पर खुला हमला’’ है। मामले की अगली सुनवाई 22 जनवरी 2026 को होगी।

