नई दिल्ली, 18 सितम्बर (अशोक “अश्क”) भारत का स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस Mk-1A, जो भारतीय वायुसेना की प्रमुख ताकत बनने की दिशा में है, अब अमेरिकी इंजन आपूर्ति में देरी के कारण मुश्किलों का सामना कर रहा है। दरअसल, अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (GE) अगस्त महीने में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को वादा किए गए F404-IN20 इंजन नहीं दे पाई, जिससे तेजस कार्यक्रम की असेंबली प्रक्रिया में रुकावट आई है। इस देरी ने भारतीय वायुसेना की तत्परता को प्रभावित किया है, जो तेजस के उत्पादन को तेज़ करने की उम्मीद कर रही है।

जनरल इलेक्ट्रिक ने पहले वादा किया था कि वह हर महीने HAL को दो इंजन प्रदान करेगा, लेकिन अगस्त में कोई इंजन आपूर्ति नहीं हो पाई। सितंबर में भी सिर्फ तीसरा इंजन ही पहुंच सका, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या GE वादा की आपूर्ति दर को बनाए रख पाएगा। GE ने अक्टूबर में इस चूक की भरपाई के लिए तीन से पांच इंजन देने का वादा किया है। इस प्रकार की देरी भारत के लिए चिंता का कारण बन गई है, क्योंकि इसका असर तेजस के उत्पादन और भारतीय वायुसेना की आपूर्ति पर पड़ रहा है।
HAL के चेयरमैन डॉ. डीके सुनील ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया कि तेजस लड़ाकू विमानों के लिए सारे एयरक्राफ्ट तैयार हैं, लेकिन इंजन की कमी के कारण उनकी डिलिवरी में देरी हो रही है। उन्होंने कहा, “हम GE 404 इंजन एयरक्राफ्ट में फिट करेंगे और हम इसे डिलीवर करने के लिए तैयार हैं, लेकिन जनरल इलेक्ट्रिक ने हमें बताया था कि वह इसकी प्रक्रिया को तेजी से पूरा करेंगे, लेकिन इसमें देरी हो रही है।”
अमेरिका से इंजन की आपूर्ति में हो रही देरी को देखते हुए, भारत को अब रूस और फ्रांस जैसे देशों पर निर्भर होने की संभावना दिख रही है। भारत ने पहले ही अपने तेजस Mk-2 और पांचवीं पीढ़ी के लाइट मीडियम कॉम्बैट एयरक्रॉफ्ट (AMCA) के लिए GE से अधिक शक्तिशाली एफ-414 इंजन का चयन किया है, हालांकि इस सौदे में कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है। जून 2023 में GE के साथ संयुक्त उत्पादन के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे, लेकिन अब तक इस पर काम की गति धीमी रही है।
फ्रांस की कंपनी Safran ने भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के साथ मिलकर 12 वर्षों के भीतर नए लड़ाकू इंजनों के प्रोटोटाइप विकसित करने का फैसला किया है। इन इंजनों की शक्ति शुरुआत में 120 किलो न्यूटन होगी, जिसे 12 साल के भीतर 140 किलो न्यूटन तक बढ़ाया जाएगा। इस परियोजना के तहत DRDO को पूरी तकनीकी जानकारी मिलेगी, जिससे भारत को भविष्य में स्वदेशी इंजन बनाने में मदद मिलेगी।
भारत रूस के साथ भी इंजन के उत्पादन में सहयोग बढ़ा सकता है। रूस, भारत को अपने Su-30MKI विमानों के लिए AL-31FP इंजन की आपूर्ति करता है, और माना जा रहा है कि वह भारत को अपने नए स्टील्थ फाइटर Su-57 में इस्तेमाल होने वाले AL-51F1 इंजन को भी बेचने का प्रस्ताव दे सकता है। भारत का GTRE (Gas Turbine Research Establishment) स्वदेशी कावेरी इंजन विकसित करने के शुरुआती चरण में है, और रूस से इस संबंध में सहयोग मिल रहा है।
भारत अपने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर लगातार बढ़ रहा है। इस दिशा में, स्वदेशी कावेरी इंजन और DRDO द्वारा विकसित किए जा रहे इंजन एक महत्वपूर्ण कदम है। अगर भारत को भविष्य में अपने लड़ाकू विमानों के लिए अधिक शक्तिशाली और भरोसेमंद इंजन की आवश्यकता होती है, तो इस स्वदेशी प्रयास से उसे अपनी रक्षा सुरक्षा में आत्मनिर्भरता प्राप्त होगी।
अमेरिका द्वारा इंजन आपूर्ति में हो रही देरी ने भारत के स्वदेशी तेजस Mk-1A लड़ाकू विमान के उत्पादन में रुकावट डाली है। हालांकि, भारत ने पहले ही फ्रांस और रूस जैसे देशों के साथ वैकल्पिक योजनाओं पर विचार किया है, लेकिन स्वदेशी प्रयासों की सफलता इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है। यदि GE वादा की आपूर्ति दर को बनाए नहीं रख पाता है, तो भारत को अपनी स्वदेशी तकनीकी क्षमता और सहयोगी देशों के साथ मिलकर दीर्घकालिक समाधान तलाशने होंगे।

