नई दिल्ली, 22 नवम्बर (अशोक “अश्क”) भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने देश में आर्थिक बराबरी सुनिश्चित करने और संविधान के वास्तविक उद्देश्यों को पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। गुरुवार को पूर्व चुनाव आयुक्त एवं पूर्व कानून सचिव जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति की 91वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक अधिकार देने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा, जब तक नागरिकों के बीच आर्थिक न्याय सुनिश्चित न किया जाए।

जोशी ने राज्यों के बीच आर्थिक असमानता को संविधान की मूल भावना के विपरीत बताते हुए सुझाव दिया कि बड़े राज्यों को तोड़कर छोटे राज्य बनाए जाने चाहिए, जिनकी जनसंख्या और चुनाव क्षेत्र लगभग बराबर हों। उन्होंने कहा कि कर्नाटक, बिहार, महाराष्ट्र, रेगिस्तानी इलाकों और नॉर्थईस्ट में रहने वाले नागरिकों की आर्थिक क्षमता में बड़ा अंतर है, जबकि सभी को समान मतदान अधिकार प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार तभी प्रभावी होता है जब आर्थिक न्याय भी मिले। अंबेडकर ने भी राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की समानता पर बल दिया था। जोशी के अनुसार, यदि राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों का समान बंटवारा नहीं हुआ तो लोकतंत्र और कल्याण के प्रति सभी प्रतिबद्धताएं आधी-अधूरी रह जाएंगी।
बिहार चुनाव परिणामों पर चल रही बहस का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि चुनावों से पहले पैसों के वितरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं—क्या यह कल्याण था या वोट खरीदने का प्रयास? उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनावों में पैसे बांटने से कल्याण नहीं होता, यह केवल आर्थिक असमानताओं को और उजागर करता है।
जोशी ने कहा कि असमान जनसंख्या और असमान विकास संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं। जनगणना और डिलिमिटेशन में देरी ने समस्या बढ़ाई है। कुछ राज्यों में आबादी बढ़ने से वे आर्थिक रूप से कमजोर हुए, जबकि कम आबादी वाले राज्य ज्यादा मजबूत बने। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश की संसदीय ताकत अधिक है, लेकिन आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है, जबकि तमिलनाडु और केरल आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम हैं।
उन्होंने समाधान के रूप में दीनदयाल उपाध्याय की अवधारणा का उल्लेख किया—देश में लगभग समान आबादी वाले अधिक संख्या में छोटे राज्य हों, ताकि संसाधनों और विकास का निष्पक्ष बंटवारा सुनिश्चित किया जा सके।

