नई दिल्ली, 28 सितम्बर (अशोक “अश्क”) कतर की राजधानी दोहा में हुए इजरायली हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा भूचाल आया है। इस हमले के तुरंत बाद सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता (डिफेंस डील) कर पूरी दुनिया को चौंका दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सऊदी अरब के अमेरिका पर घटते भरोसे को दर्शाता है। माना जा रहा है कि पहले ईरान और फिर इजरायल द्वारा कतर पर किए गए हमलों के बाद सऊदी को यह एहसास हुआ कि संकट के समय अमेरिका शायद चुप रह जाए।

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के विशेषज्ञ जोशुआ व्हाइट ने इस घटनाक्रम को “चौंकाने वाला” बताया है। उन्होंने कहा, “यह समझौता सऊदी-पाक सुरक्षा सहयोग को औपचारिक रूप से मजबूत करता है, जिसकी नींव 1982 के उस ऐतिहासिक समझौते में रखी गई थी, जिसके तहत पाकिस्तानी सैनिकों की सऊदी अरब में तैनाती की गई थी।”
इस डील के असली वजन का अंदाजा तब हुआ जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा, “जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान की परमाणु क्षमताएं सऊदी अरब को उपलब्ध कराई जाएंगी।” हालांकि बाद में उन्होंने इस बयान से यू-टर्न ले लिया, लेकिन तब तक भूचाल आ चुका था।
विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान के पास करीब 170 परमाणु हथियार हैं। यह सवाल अब ज़ोर पकड़ रहा है कि क्या पाकिस्तान वाकई सऊदी को “परमाणु छतरी” मुहैया कराएगा? यह स्थिति वैश्विक परमाणु अप्रसार समझौतों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
इतिहास में अब तक केवल दो ऐसे उदाहरण रहे हैं जहां एक देश ने दूसरे को अपनी परमाणु छतरी दी हो अमेरिका ने यूरोपीय देशों को और रूस ने बेलारूस को। अब क्या पाकिस्तान तीसरा ऐसा देश बनेगा?
हालांकि इस समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन कुछ विश्वसनीय सूत्रों और सऊदी के एक रिटायर्ड जनरल के हवाले से खबरें हैं कि इस डील में “पारंपरिक और गैर-पारंपरिक” हथियारों को शामिल किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “इसमें पाकिस्तानी परमाणु हथियारों का उल्लेख भी किया गया है।”
इस समझौते ने वैश्विक कूटनीति और सामरिक संतुलन को हिला कर रख दिया है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या यह डील एक नई परमाणु होड़ की शुरुआत है या सिर्फ एक रणनीतिक संदेश।

