नई दिल्ली, 31 अगस्त (अशोक “अश्क”) सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने शनिवार को हल्के-फुल्के अंदाज में एक गंभीर सामाजिक मुद्दे पर अपनी भूमिका को लेकर एक अनोखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि वे अब सिर्फ कानूनी बिरादरी में नहीं, बल्कि आवारा कुत्तों के मसले पर फैसले देने के कारण भारत समेत पूरी दुनिया में पहचाने जाने लगे हैं।

जस्टिस नाथ केरल में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे, जिसका उद्देश्य मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्षों से निपटना था। अपने संबोधन में उन्होंने कहा, “अब तक मैं सिर्फ अपने छोटे-मोटे कानूनी कामों के लिए जाना जाता था, लेकिन अब इन आवारा कुत्तों की बदौलत मुझे वैश्विक पहचान मिली है। मैं अपने मुख्य न्यायाधीश का आभारी हूं जिन्होंने मुझे यह मामला सौंपा।”
उन्होंने बताया कि जब वे लॉ एशिया पोला शिखर सम्मेलन में शामिल हुए, तो वहां मौजूद वकीलों और प्रतिनिधियों ने उनसे आवारा कुत्तों के केस पर सवाल पूछे। जस्टिस नाथ ने मुस्कुराते हुए कहा, “भारत के बाहर भी लोग अब मुझे पहचानने लगे हैं। डॉग लवर्स के अलावा, कुत्तों से भी मुझे आशीर्वाद और शुभकामनाएं मिल रही हैं।”
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा कि “मनुष्य सदियों से वन्यजीवों और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में रहा है, लेकिन हाल के दशकों में हमने इस संतुलन को खो दिया है। हमारा संविधान इस संघर्ष के समाधान के लिए रास्ता दिखाता है।”
दरअसल, यह मामला तब चर्चा में आया जब 11 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने दिल्ली नगर निगम को आवारा कुत्तों को पकड़ने और आठ सप्ताह में उनके लिए शेल्टर होम बनाने का आदेश दिया। इस आदेश के बाद डॉग लवर्स और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
इसके बाद मामला जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच को सौंपा गया, जिसमें जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया भी शामिल थे। इस बेंच ने 22 अगस्त को आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि टीकाकरण और नसबंदी के बाद आवारा कुत्तों को उसी स्थान पर वापस छोड़ा जाए, जहां से उन्हें पकड़ा गया था।
इस फैसले की पूरे देश में सराहना हुई और जस्टिस नाथ को कुत्तों के पक्ष में न्याय करने वाले जज के रूप में एक नई पहचान मिल गई है। उनके इस संवेदनशील रवैये ने उन्हें आम नागरिकों के बीच लोकप्रिय बना दिया है, खासकर पशु प्रेमियों के बीच।

