बिहार में सोचने में बर्बाद हो रहा कीमती समय: सोशल मीडिया, खाना और गिफ्ट पर ज्यादा ध्यान, काम पर कम फोकस

पटना, 31 अगस्त (अशोक “अश्क”) बिहार में लोग जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत के कारण अपने जीवन का कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं। महिला विकास मंत्रालय द्वारा कराए गए एक हालिया सर्वे में यह चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 60 फीसदी लोग गैरजरूरी बातों पर अत्यधिक सोचने में प्रतिदिन चार से पांच घंटे तक गंवा देते हैं, जबकि जरूरी कार्यों और पढ़ाई-लिखाई पर उनका ध्यान अपेक्षाकृत कम होता है।


यह सर्वे 15 जुलाई से 15 अगस्त 2025 के बीच मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध एक लिंक के जरिए कराया गया, जिसमें कुल 30 लाख 90 हजार 675 लोगों ने हिस्सा लिया। इसमें स्कूल-कॉलेज के छात्र, नौकरीपेशा, व्यवसायी और गृहणियां शामिल थीं। सर्वे में पूछे गए सवालों के उत्तर प्रतिभागियों को हां या ना में देने थे।
सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि करीब 50 फीसदी लोग सोशल मीडिया पर पोस्ट के लाइक्स नहीं मिलने को लेकर गंभीरता से सोचते रहते हैं, जिससे उनका ध्यान अन्य जरूरी कार्यों से भटक जाता है। वहीं, 40 फीसदी लोग रेस्टोरेंट में क्या खाना है, यह तय करने में ही 20 से 25 मिनट तक का समय बर्बाद कर देते हैं। 15 लाख लोगों ने इसे अपने लिए सबसे कठिन निर्णय बताया।
10 लाख से अधिक लोगों ने माना कि गिफ्ट या उपहार खरीदने में कई घंटे लगा देते हैं, लेकिन फिर भी संतोषजनक विकल्प नहीं चुन पाते। 35 फीसदी लोग कपड़े पहनने को लेकर दो से तीन घंटे सोचते हैं, वहीं घूमने की योजना बनाने में तीन से चार घंटे तक का समय मंथन में बीत जाता है।
सर्वे के अनुसार, 18 लाख से अधिक महिलाएं अधिक सोचने की शिकार हैं। इनमें से ज्यादातर महिलाएं घर के काम, बच्चों की देखरेख और पति या बॉस की बातों को लेकर अधिक चिंतित रहती हैं। कामकाजी महिलाएं ऑफिस में सहयोगियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ संवाद पर काफी समय तक सोचती रहती हैं, जिससे मानसिक तनाव बढ़ता है।
मनोवैज्ञानिक समिधा तिवारी का कहना है कि जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत मानसिक तनाव को जन्म देती है और इसका सीधा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि “सोच को नियंत्रित करने और फोकस बढ़ाने की आवश्यकता है।”
वहीं, मनोवैज्ञानिक कुमुद श्रीवास्तव ने कहा कि “लोगों में दिखावे की प्रवृत्ति और खुद को बेहतर साबित करने की होड़ बढ़ गई है। जब वे किसी भी मानक में खुद को पीछे पाते हैं, तो सोचने लगते हैं कि क्या करें जिससे सबका ध्यान उनकी ओर जाए।”
15% नौकरीपेशा लोग ही अपने काम से जुड़ी चिंताओं पर सोचते हैं।
4% युवा सोचते हैं कि किस टॉपिक पर रील्स बनाएं।
35% लोग कपड़ों के चयन में घंटों सोचते हैं।
यह सर्वे बताता है कि बिहार में समय के सदुपयोग की आदत विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि लोग अधिक उत्पादक बन सकें और मानसिक रूप से स्वस्थ रह सकें।

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